दिल्ली में 10,448 बेघर मतदाता अपनी पहचान दस्तावेज़ों की कमी के कारण चुनावी सूची से हटाए जाने की आशंका में हैं। बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) इस विशेष पुनरावलोकन (SIR) में इन लोगों को सत्यापित करने में कई बाधाओं का सामना कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- दिल्ली में 10,448 बेघर मतदाता सूची में हैं
- पता, दस्तावेज़ की कमी से सत्यापन मुश्किल
- ब्लो अतिरिक्त रात्रि दौरों की योजना बना रहे हैं
दिल्ली में चल रहे विशेष तीव्र पुनरावलोकन (SIR) के तहत 1.40 करोड़ मतदाताओं को घर‑घर जाकर वोटर फ़ॉर्म वितरित किए गए हैं, परंतु बेघर मतदाता सबसे कठिन समूह बन कर उभरे हैं। पहचान‑कार्ड पर केवल क्षेत्र या स्तम्भ संख्या लिखी होने के कारण, बूथ‑लेवल‑ऑफ़िसर (BLO) उन्हें ट्रैक करने में असमर्थ हैं, जिससे इन लोगों को सूची से हटाए जाने का डर सताता है।
पिछला इतिहास और वर्तमान प्रक्रिया
जून 16 को फ्रीज़ की गई दिल्ली की मौजूदा निर्वाचन सूची में लगभग 1.45 करोड़ मतदाता थे। SIR के हिस्से के रूप में, 1.40 करोड़ मतदाताओं को फॉर्म दिया गया, परंतु अभी तक केवल 14.03 लाख फॉर्म डिजिटल रूप में उपलब्ध हैं। इस प्रक्रिया का समापन 29 जुलाई को होगा, इसके बाद ड्राफ्ट रोल 5 अगस्त को प्रकाशित होगा और अंतिम रोल 7 अक्टूबर को घोषित किया जाएगा।
बेघर मतदाताओं की विशेष कठिनाइयाँ
बहुतेरे बेघर मतदाता केवल आधार और वोटर आईडी रखते हैं, परंतु उन्हें पूर्व SIR रिकॉर्ड, माता‑पिता के वोटर आईडी या जन्म‑प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज़ प्रदान करने की आवश्यकता होती है। कई वृद्ध मतदाता अपने स्वयं के या अपने माता‑पिता के विवरण याद नहीं कर पाते, और कई वर्षों से परिवार से संपर्क टूट चुका है। यह दस्तावेज़ीय खालीपन BLO को “शिफ्टेड” (स्थान बदल गया) के टैग से चिन्हित करने पर मजबूर करता है।
ब्लो की रणनीति और चुनौतियाँ
ब्लो ने बताया कि वे बेघर आबादी वाले क्षेत्रों में कई बार दौरे कर चुके हैं, परंतु पते की अस्पष्टता और बार‑बार होने वाले बेदखली अभियानों के कारण कई बार नज़रअंदाज़ होते हैं। कुछ ब्लो ने बताया कि वे अगले कुछ दिनों में देर‑रात के दौरों की योजना बना रहे हैं, जब बेघर लोग अपने अस्थायी ठिकानों पर होते हैं। समय‑सीमा के दबाव और सीमित संसाधनों के कारण, प्रत्येक व्यक्ति की विस्तृत खोज में कई घंटे खर्च नहीं किए जा सकते।
व्यक्तिगत कहानियाँ
इक़बाल ख़ान, 30, ने बताया कि वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ लोधी रोड पर फुटपाथ पर पिछले दस सालों से रह रहा है। उनका फॉर्म “बेघर, संस्थागत क्षेत्र, लोधी रोड, दिल्ली” के रूप में दर्ज है, परंतु पिछले SIR से जुड़ी जानकारी खाली छोड़नी पड़ी। उनकी पत्नी बिबी हलिमा खातून को भी फॉर्म में पहचान‑कार्ड के उद्देश्य को लेकर भ्रम था, और उन्होंने कहा कि उन्हें पता नहीं कि यह प्रक्रिया बांग्लादेशियों या अन्य आप्रवासियों को हटाने के लिए है।
एक 60‑वर्षी महिला, नैनकुमार, जो एक शेल्टर में रहती हैं, ने कहा कि उनका परिवार का रिकॉर्ड अब उपलब्ध नहीं है और वे अपनी पेंशन के लिए उपयोग किए जाने वाले दस्तावेज़ों को खोने का डर रखती हैं।
इन व्यक्तिगत कहानियों से स्पष्ट है कि बिना स्थायी पते और पर्याप्त दस्तावेज़ों के बेघर मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया में खुद को बाहर महसूस कर रहे हैं।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि वर्तमान चुनौतियों को हल नहीं किया गया, तो कई बेघर मतदाता अपनी वैधता खो सकते हैं, जिससे उनकी राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आएगी। यह न केवल सामाजिक असमानता को गहरा करेगा, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या को हल करने के लिए अधिक लचीली पहचान‑परीक्षा और विशेष सहायता कार्यक्रम आवश्यक हैं।