असम सरकार ने पिछले दो वर्षों में 193 घोषित विदेशियों को बांग्लादेश में ‘धकेला’ है, जिसमें 67 को 1950 के प्रवासी निष्कासन अधिनियम के तहत निष्कासित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया में कमी को उजागर कर सभी मामलों को पुनः सुनवाई के लिए भेजा। यह कदम राज्य की सुरक्षा, मानवीय अधिकारों और भारत‑बांग्लादेश संबंधों पर गहरा असर डालता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- 2 वर्षों में 193 घोषित विदेशियों को बांग्लादेश में धकेला गया
- 67 मामलों में 1950 के प्रवासी (निष्कासन) अधिनियम को पुनः सक्रिय किया गया
- सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रियात्मक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सभी 27 मामलों को पुनः परीक्षण हेतु भेजा
असम में मई 2025 से शुरू हुई “धकेलने” की नीति ने राज्य सरकार को एक विवादास्पद साधन प्रदान किया, जिससे घोषित विदेशियों को बिना द्विपक्षीय वार्ता के सीधे सीमा पार भेजा जाता है। इस प्रक्रिया का औपचारिक नाम पुर्नस्थापित प्रवासी (Expulsion) एक्ट, 1950 है, जिसे पिछले साल पुनः सक्रिय किया गया।
संख्यात्मक विवरण और भौगोलिक वितरण
असम विधानसभा में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 1 जुलाई 2024 से 30 जून 2026 तक कुल 1,679 व्यक्तियों को बांग्लादेश भेजा गया। इनमें 193 को विदेशियों के रूप में घोषित किया गया और “धकेला” गया, जबकि 67 को 1950 के अधिनियम के तहत “निष्कासन” के आदेश के तहत भेजा गया। सबसे अधिक मामलों में नागाॉन (19) और कोक्राझर (16) जिलों से शरणार्थी शामिल हैं।
न्यायिक प्रतिक्रिया और सुप्रीम कोर्ट का आदेश
गौहाटी हाई कोर्ट ने पहले कई मामलों में विदेशियों की त्रिब्यूनल द्वारा किए गए निर्णयों को बिना पक्ष सुनाए मान्य किया, जिससे प्रक्रिया में गंभीर कमी उभरी। 14 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इन 27 निर्णयों को रद्द कर सभी मामलों को पुनः सुनवाई के लिए संबंधित त्रिब्यूनलों को भेज दिया, यह बात स्पष्ट करते हुए कि नागरिकता निर्धारण को “न्यायसंगत, वैध और तर्कसंगत प्रक्रिया” के तहत होना चाहिए।
कानूनी अधिकार और अपील प्रक्रिया
विधिक रूप से, विदेशियों के त्रिब्यूनल द्वारा घोषित व्यक्ति गौहाटी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं। सरकार ने कहा है कि कोई भी निष्कासित व्यक्ति तब तक पुनःस्थापित नहीं किया जाएगा जब तक उसकी अपील प्रलंबित है, किन्तु अब तक कोई भी अपील दर्ज होने की सूचना उपलब्ध नहीं है। यह तथ्य प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।
भविष्य की संभावनाएँ और सामाजिक प्रभाव
यह नीति न केवल मानवीय अधिकारों के उल्लंघन की आशंका पैदा करती है, बल्कि भारत‑बांग्लादेश संबंधों में तनाव भी बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के “धकेलने” को कानूनी रूप से ठोस आधार नहीं मिला, तो यह भविष्य में अधिक व्यापक प्रवासी प्रवाह और सामाजिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है। राज्य की सुरक्षा हितों और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के बीच संतुलन स्थापित करना अब अनिवार्य हो गया है।