रम सेवक शर्मा, UIDAI के संस्थापक निदेशक, ने SIR प्रक्रिया में दस्तावेज‑भारी दृष्टिकोण को चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि आधार डेटाबेस को सही पहचान प्रमाण के रूप में न मानना लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- आधार डेटा को पता प्रमाण के रूप में उपयोग न करने से नागरिकों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता है।
- SIR प्रक्रिया में दोहरावदार दस्तावेज़ीकरण लोकतांत्रिक समावेश को खतरे में डाल सकता है।
- डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा (DPI) को पुनः मूल्यांकन करना आवश्यक है।
रम सेवक शर्मा, जिन्होंने यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (UIDAI) की स्थापना की थी, ने विशेष तीव्र पुनरावलोकन (SIR) प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि सरकार द्वारा आधार को वैध पता प्रमाण के रूप में न मानना, एक ऐसी डिजिटल बुनियादी ढाँचा को व्यर्थ बना रहा है जिसे विश्व स्तर पर प्रशंसा मिली है।
पृष्ठभूमि और तकनीकी आधार
आधार भारत की सबसे बड़ी बायो‑मेट्रिक पहचान प्रणाली है, जिसमें न सिर्फ व्यक्तिगत पहचान संख्या बल्कि फिंगरप्रिंट, आयरिश और आयु प्रमाण भी सम्मिलित है। इस डेटा को कई सरकारी कल्याण योजनाओं में उपयोग किया जाता है, जिससे लाभार्थी को सीधे बैंक खाते में भुगतान किया जा सकता है। हालांकि, SIR में अब नागरिकों से जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाण और नागरिकता दस्तावेज़ जैसी अतिरिक्त कागजी कार्रवाई की मांग की जा रही है।
सिर्फ़ कागज नहीं, लोकतांत्रिक जोखिम
शर्मा का कहना है कि यह दस्तावेज‑भारी प्रक्रिया, विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े वर्गों में, अभिभूत कर सकती है। जब राज्य स्वयं अपने रिकॉर्ड को सटीक रखने में विफल रहता है, तो नागरिकों से अतिरिक्त प्रमाण माँगना न्यायसंगत नहीं है। इससे वैध मतदाता को disenfranchised (वोट देने से वंचित) होने का जोखिम बढ़ जाता है, जो संविधान की समानता सिद्धांत के विरुद्ध है।
सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने पहले SIR के प्रारम्भिक चरण में चुनाव आयोग को समावेशी दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दिया था, लेकिन पश्चिम बंगाल में हुई प्रक्रिया में यह सतर्कता कम देखी गई। न्यायालय को अब इस मुद्दे को फिर से उठाना चाहिए और आयोग को आधार के पूर्ण उपयोग की ओर प्रेरित करना चाहिए, क्योंकि यह भारत की डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा (DPI) का अभिन्न हिस्सा है।
सारांश में, आधार को केवल एक वैध पहचान नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक सुरक्षा उपकरण माना जाना चाहिए। यदि सरकार इस बुनियादी ढाँचे को पर्याप्त रूप से नहीं अपनाती, तो डिजिटल गवर्नेंस का लक्ष्य—नागरिकों से कम माँग, अधिक सेवा—भ्रष्ट हो जाता है।