जंतर mantar में सक्रियवादी सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के 17वें दिन उनका स्वास्थ्य तेज़ी से गिरा है, मांसपेशी क्षति स्पष्ट है। इस दौरान अरुंधति रॉय, नसीरुद्दीन शाह समेत कई सार्वजनिक हस्तियों ने हड़ताल समाप्त करने का आह्वान किया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति 17वें दिन गंभीर रूप से बिगड़ी
  • भूख हड़ताल के कारण मांसपेशी क्षति और ऊर्जा का अभाव
  • अरुंधति रॉय, नसीरुद्दीन शाह सहित कई हस्तियों ने हड़ताल समाप्ति की अपील की

सोनम वांगचुक, लद्दाख‑आधारित पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक अभियंता, ने 17 जुलाई को जंतर mantar में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, जब उन्होंने सरकार की जल‑संसाधन नीति और पर्यटन परियोजनाओं के विरुद्ध विरोध किया। पिछले कई सालों में उन्होंने लद्दाख की पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा के लिए कई मुकदमों में भाग लिया था, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। इस हड़ताल का मूल उद्देश्य सरकार को लद्दाख की जल‑सुरक्षा एवं स्थानीय अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाना था।

स्वास्थ्य प्रभाव

हड़ताल के 17वें दिन, सोनम की शारीरिक स्थिति में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। चिकित्सकीय रिपोर्टों के अनुसार, उनका वजन 12 किलोग्राम तक घट गया है और मांसपेशी द्रव्यमान में उल्लेखनीय क्षति हुई है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि निरंतर भूख हड़ताल से हृदय‑संबंधी जटिलताएँ, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और प्रतिरक्षा प्रणाली का क्षीणन हो सकता है। इन जोखिमों को देखते हुए, कई डॉक्टरों ने तुरंत भोजन प्रदान करने की अपील की है।

सार्वजनिक प्रतिक्रिया

हड़ताल की खबर के बाद, साहित्यिक और फिल्म जगत की कई हस्तियों ने सामाजिक मीडिया पर समर्थन या विरोध दोनों की आवाज़ उठाई। लेखिका अरुंधति रॉय ने अपने ट्विटर अकाउंट से लिखा कि “मानव जीवन को जोखिम में डालकर कोई भी संदेश नहीं दिया जा सकता, इसलिए इस हड़ताल का शीघ्र अंत आवश्यक है।” इसी तरह, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने सार्वजनिक मंच पर कहा कि “हड़ताल का उद्देश्य मान्य है, परन्तु मानव जीवन का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।” इन टिप्पणियों ने जनता में व्यापक चर्चा को जन्म दिया और सरकार पर दबाव बढ़ा।

भविष्य की संभावनाएँ

वर्तमान स्थिति में, यदि सोनम को तुरंत पोषण और चिकित्सा सहायता नहीं मिली, तो उनके स्वास्थ्य को अपरिवर्तनीय क्षति हो सकती है। साथ ही, सरकार को इस मुद्दे को संवेदनशीलता से संभालना पड़ेगा, क्योंकि लद्दाख की जल‑सुरक्षा को लेकर लंबे समय से सामाजिक तनाव मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि संवाद‑आधारित समाधान, जिसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो, ही दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित कर सकता है। इस बीच, नागरिक समाज और अंतर्राष्ट्रीय मानवीय संगठनों की निगरानी जारी रहेगी।