जनाग्रह केंद्र द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया कि कर्नाटक ने 2026‑27 वित्तीय वर्ष में प्रति व्यक्ति शहरी अनुदान में अपने समकक्ष राज्यों की तुलना में सबसे नीचे स्थान प्राप्त किया, जिससे शहरों की बुनियादी सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कर्नाटक का प्रति व्यक्ति शहरी अनुदान ₹2,244 है, जबकि केरल में ₹6,251 है।
  • तमिलनाडु और ओडिशा ने 2018‑19 से अनुदान में 200% से अधिक वृद्धि की, कर्नाटक केवल 25% ही बढ़ा।
  • शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय निर्भरता XVI राज्य वित्त आयोग के अनुदानों पर बढ़ी, जबकि चुनावों में देरी से शासन में लोकतांत्रिक अंतराल पैदा हुआ।

जनाग्रह सेंटर फॉर सिटिज़नशिप एंड डेमोक्रेसी ने प्रकाशित "कर्नाटक के वित्तीय विकेंद्रीकरण का उलटा अध्याय" रिपोर्ट में उजागर किया कि कर्नाटक ने 2026‑27 वित्तीय वर्ष में शहरी क्षेत्रों को मिलने वाले प्रति व्यक्ति राज्य वित्त आयोग (SFC) अनुदान में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे निचले स्थान पर पहुंच गया है। केरल, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों के मुकाबले कर्नाटक का अनुदान मात्र ₹2,244 है, जबकि केरल में यह ₹6,251 तक पहुंचता है।

पड़ोसी राज्यों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण

रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु और ओडिशा ने 2018‑19 से शहरी अनुदान में क्रमशः 203% और 214% की चौंकाने वाली वृद्धि दर्ज की है, जबकि कर्नाटक ने केवल 25% की मामूली बढ़ोतरी की और पिछले तीन वर्षों में कोई वृद्धि नहीं देखी। यह अंतर इस तथ्य को भी दर्शाता है कि कर्नाटक की शहरी जनसंख्या, जो वर्तमान में राज्य की कुल जनसंख्या का 46% है, 2036 तक 51% तक बढ़ने की संभावना है, फिर भी उसके शहरी वित्तीय हिस्सेदारी अनुपातिक रूप से कम बनी हुई है।

वित्तीय विकेंद्रीकरण में ऐतिहासिक गिरावट

पहले कर्नाटक को स्थानीय शासन को वित्तीय शक्ति और अधिकार देने में भारत में अग्रणी माना जाता था। 5वें राज्य वित्त आयोग (SFC) ने 2025 में 60% राजस्व को स्थानीय निकायों को हस्तांतरित करने की सिफारिश की, जिसमें 25% शहरी क्षेत्रों के लिए निर्धारित था। हालांकि, राज्य सरकार ने केवल 50% ही लागू किया, जिससे शहरी हिस्सेदारी 30% तक सीमित रह गई और कुल ₹4,972 करोड़ शहरी निकायों तक पहुँचे। यह नीति‑परिवर्तन कर्नाटक के वित्तीय विकेंद्रीकरण को उलटे दिशा में ले गया है।

शहरों की मौजूदा चुनौतियां और लोकतांत्रिक अंतराल

शहरी अनुदानों की कमी के कारण कर्नाटक के शहरों में खराब सड़कें, कचरे का जमाव, जल निकासी और जल आपूर्ति जैसे बुनियादी मुद्दे उभर कर सामने आए हैं। साथ ही, 18 शहर निगमों में से 13, जिनमें ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) के पाँच निगम भी शामिल हैं, बिना निर्वाचित परिषद के कार्य कर रहे हैं, जिससे शहरी प्रशासन में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की कमी स्पष्ट होती है।

विशेषज्ञों की राय और आगे का मार्ग

जनाग्रह के वरिष्ठ सलाहकार संतोष नारगुंड ने कहा, "एक समय में विकेंद्रीकृत शासन के अग्रणी कर्नाटक अब पीछे हट रहा है। यदि मुख्यमंत्री की ‘बेंगलुरु से आगे और अधिक बेंगलुरु’ की दृष्टि को सच करना है, तो शहरों को तत्काल फिस्कल और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है।" इसी तरह, सार्वजनिक वित्त प्रबंधक मनीषा मारुलासिद्धप्पा ने उल्लेख किया कि कर्नाटक ने राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों पर कार्यवाही रिपोर्ट विधानसभा में नहीं प्रस्तुत की, जिससे जवाबदेही का अभाव बना है। उन्हें आशा है कि भविष्य में यह प्रथा सामान्य बन जाएगी।