तीन दशकों की निष्ठा के बाद मदन मित्रा ने त्रिनामूल कांग्रेस के विद्रोही गुट में शरण ली, जिससे ममता बनर्जी के राजनीतिक आधार को बड़ा झटका लगा है। यह कदम अब पश्चिम बंगाल की राजनैतिक दिशा को पुनः परिभाषित कर सकता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मदान मित्रा ने अब्बीसैक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराते हुए विद्रोही त्रिनामूल गुट में शामिल हुए।
  • तीस साल की निष्ठा के बाद उनका प्रस्थान पार्टी में गहरा प्रतीकात्मक क्षति लाता है।
  • यह घटना ममता बनर्जी के लिए आगामी चुनावों में संभावित संकट का संकेत देती है।

त्रिनामूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ विधायक मदन मित्रा ने अचानक ममता बनर्जी के कैम्प से अलग होकर पार्टी के विरोधी गुट में मिलकर एक नया मोड़ खींचा है। मित्रा ने इस कदम का कारण मुख्य रूप से ममता के भतीजे, लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी को बताया, जो अब पार्टी के आंतरिक संकट के प्रमुख कारण बन गये हैं।

पिछले तीन दशकों की निष्ठा

मदान मित्रा का नाम अक्सर ममता बनर्जी के साथ जुड़ा रहता है। 1990 के दशक में एक टैक्सी चालक और यूनियन नेता के रूप में शुरू हुई उनकी राजनीति, भारतीय युवा कांग्रेस में ममता के साथ मिलकर विकसित हुई। 1993 में युवा कांग्रेस के विरोध में पुलिस की गोलीबारी के दौरान मित्रा ने ममता का दृढ़ समर्थन किया, जिससे उनका बंधन और भी गहरा हो गया। 1998 में ममता ने कांग्रेस छोड़ कर त्रिनामूल कांग्रेस का गठन किया, और मित्रा ने तुरंत ही इस नई पार्टी में शामिल होकर कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।

पदों की ऊँचाई और गिरावट

2000 में उन्हें पार्टी के सचिव के रूप में नियुक्त किया गया और त्रिनामूल युवा कांग्रेस के प्रमुख का पद भी संभाला। 2011 में बाम्बी का 34 साल का बायडब्ल्यूएफएफ अधीनस्थ शासन समाप्त हो कर त्रिनामूल कांग्रेस सत्ता में आई, तब मित्रा को खेल और परिवहन विभाग का मंत्री बनाया गया। हालांकि 2015 में सरधा चिट फंड केस में आरोपियों में उनका नाम आया, जिससे उन्हें मंत्रालय से हटाना पड़ा और सीबीआई ने गिरफ्तार किया। फिर भी ममता ने उनका समर्थन जारी रखा, जो उनकी व्यक्तिगत निष्ठा को दर्शाता है।

वर्तमान विद्रोह के कारण

पश्चिम बंगाल के चुनावों में टीएमसी ने भारी हार झेली, और कई विधायक तथा सांसद विभाजित हो गये। रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व में 60 में से 80 विधायक निकल गये, जबकि 20 सांसद राष्ट्रीय नागरिक पार्टी (एनसीपीआई) में मिल गये। इस गड़बड़ी के बीच मित्रा का विद्रोह पार्टी के भीतर और अधिक अस्थिरता का संकेत है। मित्रा ने स्पष्ट रूप से कहा, “मैं अब ममता के भीतर प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रहा हूँ,” और अभिषेक बनर्जी को इस संकट का मुख्य कारण बताया।

भविष्य की संभावनाएँ

ममता के लिए मित्रा का प्रस्थान व्यक्तिगत और राजनैतिक दोनों रूप से दर्दनाक है। मित्रा न केवल एक अनुभवी राजनेता हैं, बल्कि उनके रंगीन कुर्ते, सनग्लास और वायरल सोशल मीडिया क्लिप उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाते हैं। उनका जाने से टीएमसी के प्रतिद्वंदियों को नई ऊर्जा मिल सकती है, जबकि ममता को अपने दल को फिर से एकजुट करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षण ममता के लिए एक निर्णायक मोड़ हो सकता है, पर उनकी “स्ट्रिट फाइटर” छवि दिखाती है कि वह फिर से उभर सकती हैं।