भारी बारिश और देरी के बावजूद, पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों की यात्रा फिर से शुरू हो गई है। लाखों श्रद्धालु भक्ति भाव से रथ खींचने में जुटे हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भारी बारिश के कारण गुरुवार को रथ यात्रा की प्रक्रिया में देरी हुई थी।
  • भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों की यात्रा शुक्रवार को पुनः शुरू हुई।
  • श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) के अनुसार, लाखों की संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचे हैं।
  • देवता शुक्रवार रात तक रथों पर ही विराजमान रहेंगे और शनिवार को गुंडिचा मंदिर पहुंचेंगे।

ओडिशा के पुरी में वार्षिक रथ यात्रा का उत्साह थमने का नाम नहीं ले रहा है। गुरुवार को हुई भारी बारिश और 'पहांडी' अनुष्ठान में हुई देरी के बाद, शुक्रवार सुबह 'जय जगन्नाथ' के गगनभेदी जयघोष के साथ रथ खींचने का कार्य फिर से सुचारू रूप से शुरू हो गया। लाखों की संख्या में उमड़े श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के विशाल रथों को खींचकर अपनी अटूट आस्था का परिचय दिया।

देरी के कारण और प्रशासनिक व्यवस्थाएं

अनुष्ठान में देरी के कारणों पर स्पष्टीकरण देते हुए श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) के मुख्य प्रशासक अरबिंद पाढ़ी ने बताया कि 'पहांडी' प्रक्रिया में लगभग एक घंटे का विलंब हुआ था। भारी बारिश के कारण भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के संचालन में भी बाधा आई, जिसके चलते रथों का गंतव्य तक पहुँचना संभव नहीं हो पाया था। बारिश के कारण भगवान का पारंपरिक 'ताहिका' (अलंकृत फूलों का मुकुट) भी हटाना पड़ा क्योंकि वह गीला होकर भारी हो गया था।

भक्तों का अटूट विश्वास और भव्य दृश्य

प्रशासन ने ग्रैंड रोड (बड़ा डांडा) पर जमा हुए बारिश के पानी को निकालने के लिए विशेष प्रबंध किए थे ताकि श्रद्धालुओं को असुविधा न हो। गजपति महाराजा दिव्यासिंह देव, जिन्हें भगवान का प्रथम सेवक माना जाता है, ने स्पष्ट किया कि रथ यात्रा के निर्धारित समय से एक दिन बाद रथ खींचना कोई असामान्य बात नहीं है। उन्होंने कहा कि अंधेरा और मौसम की प्रतिकूलता के कारण गुरुवार को रथों की गति रोक दी गई थी।

आगे की योजना और धार्मिक महत्व

धार्मिक परंपराओं के अनुसार, तीनों देवता शुक्रवार की रात तक अपने-अपने रथों पर ही विराजमान रहेंगे। शनिवार, 18 जुलाई को वे अपने जन्मस्थान, गुंडिचा मंदिर में प्रवेश करेंगे। यह नौ दिवसीय उत्सव ओडिया महीने 'आषाढ़ शुक्ल तिथि' के दूसरे दिन मनाया जाता है, जो एकमात्र अवसर है जब देवता अपने रत्न सिंहासन को छोड़कर सार्वजनिक रूप से भक्तों को दर्शन देते हैं।