सुप्रीम कोर्ट ने एनिमेटेड फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ' की प्रदर्शनी की अनुमति दे दी है, लेकिन इसे पुरी की रथ यात्रा समाप्त होने के बाद ही रिलीज करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि एनीमेशन से आस्था कम नहीं होती।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सुप्रीम कोर्ट ने एनिमेटेड फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज पर लगी रोक को हटा दिया है।
  • फिल्म को 28 जुलाई, 2026 या उसके बाद ही रिलीज करने की अनुमति दी गई है।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि एनीमेशन और कल्पना से किसी की धार्मिक आस्था प्रभावित नहीं होती।
  • यह निर्णय ओडिशा सरकार और मंदिर ट्रस्ट की आपत्तियों के बाद आया है।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए एनिमेटेड फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ' के प्रदर्शन की अनुमति दे दी है। हालांकि, अदालत ने भावनाओं का सम्मान करते हुए एक बीच का रास्ता निकाला है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि फिल्म को पुरी की पवित्र रथ यात्रा संपन्न होने के बाद, यानी 28 जुलाई, 2026 या उसके बाद ही सिनेमाघरों में रिलीज किया जा सकता है।

आस्था बनाम कल्पना: अदालत का रुख

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इस मामले में एक अत्यंत दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया। ओडिशा सरकार और पुरी जगन्नाथ मंदिर के ट्रस्टियों द्वारा फिल्म के खिलाफ की गई आपत्तियों पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, "भक्ति हर व्यक्ति के लिए एक आंतरिक विषय है। क्या एक एनिमेटेड फिल्म किसी की श्रद्धा को कम कर सकती है? स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार कल्पना को कैसे मापा जा सकता है? यह केवल कल्पना का खेल है।"

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी संघर्ष

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब ओडिशा उच्च न्यायालय ने फिल्म की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगा दिया था, बावजूद इसके कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने इसे मंजूरी दे दी थी। फिल्म निर्माता 'एली एनिमेशन' (Ele Animations) ने उच्च न्यायालय के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। फिल्म निर्माताओं के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने तर्क दिया कि फिल्म का उद्देश्य बच्चों में भक्ति की भावना जगाना है और पौराणिक कथाओं को आधुनिक माध्यम से सरल बनाना है। उन्होंने 'बाल गणेश' और 'बाल हनुमान' जैसे सफल उदाहरण भी दिए।

विवाद का मुख्य कारण

ओडिशा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि फिल्म में भगवान के चित्रण के कुछ हिस्से आपत्तिजनक हैं। उन्होंने कहा कि साहित्यिक स्वतंत्रता तो है, लेकिन धार्मिक प्रतीकों में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए फिल्म को धार्मिक उत्सव के बाद रिलीज करने का आदेश देकर संतुलन बनाए रखा।