संयुक्त राज्य अमेरिका‑भारत के सहयोग से चल रहे NISAR उपग्रह ने एंटार्कटिका की बर्फ में एक अद्वितीय ‘हम्मिंगबर्ड’ पैटर्न का पता लगाया। अब L‑band एवं S‑band रडार डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, जिससे वैज्ञानिकों को ग्लेशियर गति और पर्यावरणीय परिवर्तन को बेहतर समझने में मदद मिलेगी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • US-India के NISAR उपग्रह ने एंटार्कटिका की बर्फ में ‘हम्मिंगबर्ड’ जैसा पैटर्न दिखाया।
  • L‑band और S‑band रडार डेटा अब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।
  • डेटा वैज्ञानिकों को बर्फीले बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में मदद करेगा।

NASA और ISRO के संयुक्त मिशन NISAR (NASA‑ISRO Synthetic Aperture Radar) ने जुलाई 20 से अपने दो रडार उपकरणों से एकत्रित डेटा को खुले तौर पर उपलब्ध कराया है। इस डेटा के माध्यम से प्रकाशित पहली छवि एंटार्कटिका के पूर्वी हिस्से में स्थित नुनाटक ज़ेटरजव्शिज़जा को दर्शाती है, जहाँ बर्फ के दरारें हरे रंग में दिखती हैं और चिकनी सतह मैजेंटा रंग में। यह दृश्य अपने आकार में एक ‘हम्मिंगबर्ड’ की तरह प्रतीत होता है, जिससे वैज्ञानिक और आम जनता दोनों का ध्यान आकर्षित हुआ है।

उपग्रह के L‑band रडार ने अगस्त 2025 में एकत्रित संकेतों को उपयोग करके इस जटिल चित्र को तैयार किया। रडार संकेतों की ध्रुवीकरण (पोलराइज़ेशन) के आधार पर सतह की विशेषताएँ अलग‑अलग रंगों में दिखायी गई हैं: क्षैतिज ध्रुवीकरण वाले संकेत मैजेंटा रंग में, जबकि ऊर्ध्वाधर ध्रुवीकरण वाले संकेत हरे रंग में दर्शाए गए हैं, जो गहरी दरारों (क्रेवेसेस) को उजागर करता है। इस प्रकार NISAR बर्फ के नीचे छिपी संरचनाओं को भी स्पष्ट रूप से दिखा रहा है, जो ऑप्टिकल इमेजिंग से संभव नहीं है।

इतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

NISAR मिशन का प्रारंभिक लॉन्च 30 जुलाई 2025 को भारत के सतिश धवन स्पेस सेंटर से हुआ था, जो दो देशों के अंतरिक्ष सहयोग का एक प्रमुख उदाहरण है। इस मिशन में दो रडार सिस्टम – L‑band और S‑band – उपयोग किए गए हैं, जो क्रमशः बड़े पैमाने पर वनस्पति कवर और छोटे‑पैमाने पर सतही विवरण को कैप्चर करते हैं। लॉन्च के बाद से, मिशन टीम ने हर 12 दिन में पृथ्वी के लगभग सभी भूमि और बर्फ‑आवृत क्षेत्रों का दोबारा निरीक्षण किया है, जिससे शहरी, कृषि, भूस्खलन, भूकंप और यहाँ तक कि मेक्सिको सिटी की जमीन के गिरने जैसे विविध परिदृश्यों का डेटा उपलब्ध हुआ है।

“NISAR की दोहरी रडार तकनीक पृथ्वी के बदलते लैंडस्केप को समझने में क्रांति लाएगी,” कहा गया।

Why This Matters (इसके मायने क्या हैं)

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध यह डेटा वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को ग्लेशियर गति, समुद्री स्तर के परिवर्तन और बर्फीले क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को त्वरित रूप से मॉनिटर करने में सक्षम करेगा। इस प्रकार, जलवायु मॉडल की सटीकता में सुधार होगा और संभावित बाढ़ या समुद्र‑स्तर वृद्धि से संबंधित जोखिम‑आकलन अधिक विश्वसनीय बनेंगे।

साथ ही, NISAR का खुला डेटा प्लेटफ़ॉर्म भारत और अमेरिका के बीच तकनीकी सहयोग को मजबूत करता है, जिससे दोनों देशों की वैज्ञानिक क्षमताएँ बढ़ती हैं और भविष्य में अधिक जटिल अंतरिक्ष मिशनों के लिए बुनियाद तैयार होती है। यह सहयोग न केवल वैज्ञानिक प्रगति बल्कि आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को भी सुदृढ़ करता है।

क्या आप जानते हैं? (Did You Know?): NISAR पहला ऐसा उपग्रह है जिसमें दो अलग‑अलग रडार बैंड एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर स्थापित हैं, जो वनस्पति कवर से लेकर बर्फ‑आधारित संरचनाओं तक विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।

Frequently Asked Questions (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q: NISAR डेटा को किस प्रकार एक्सेस किया जा सकता है?
A: डेटा NASA के Earthdata पोर्टल और ISRO के Bhoonidhi पोर्टल पर मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है।

Q: इस ‘हम्मिंगबर्ड’ इमेज का वैज्ञानिक महत्व क्या है?
A: यह इमेज दिखाती है कि कैसे बर्फ के प्रवाह में दरारें बनती हैं, जिससे ग्लेशियर की गति और तनाव को समझना आसान होता है।