डोनाल्ड ट्रम्प ने फिफा को फोलरिन बॉलोगन के लाल कार्ड की पुनः समीक्षा करने का अनुरोध किया, जबकि उन्होंने स्वयं कार्ड के प्रभाव को समझा नहीं था। यह मामला अमेरिकी फुटबॉल, अंतरराष्ट्रीय नियमों और राजनीतिक हस्तक्षेप के संगम को उजागर करता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में एक साक्षात्कार में बताया कि उन्होंने फिफा के डिसिप्लिनरी कमेटी से फोलरिन बॉलोगन के लाल कार्ड की समीक्षा का अनुरोध किया। यह अनुरोध तब आया जब बॉलोगन को यूईएफए यूरोपीय चैंपियनशिप के 32वें फाइनल में बोस्निया के डिफेंडर की टखने पर पैर रखने के बाद सीधे लाल कार्ड दिखाया गया था।
लाल कार्ड का मूल सिद्धांत और बॉलोगन का मामला
फुटबॉल में लाल कार्ड का अर्थ है खिलाड़ी को तुरंत खेल से बाहर करना और आमतौर पर अगले मैच में प्रतिबंध लगना। बॉलोगन को दिखाए गए लाल कार्ड के बाद, यूएस टीम ने 2-0 से जीत हासिल की, परंतु बॉलोगन को अगले चरण में खेलने से रोका गया। फिफा ने बाद में अपने अनुच्छेद 27 के तहत एक‑खेल प्रतिबंध को हटाकर उसे एक साल के प्रोबेशन पर रखा, जिससे वह उसी तरह के उल्लंघन न करने पर फिर से खेल सकता है।
ट्रम्प का हस्तक्षेप और उसका कारण
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रम्प ने कहा, "मैंने समीक्षा का अनुरोध किया क्योंकि मुझे नहीं लगा कि यह फाउल था। दो खिलाड़ी पूरी रफ्तार से दौड़ रहे थे और टकरा गए, यह कोई इन्फ्रैक्शन नहीं था।" उन्होंने यह भी कहा कि प्रारम्भ में उन्हें नहीं पता था कि लाल कार्ड का मतलब अगले मैच में निलंबन है, और इसे "अन्यायपूर्ण नियम" कहा।
राजनीतिक और खेल प्रशासनिक प्रभाव
ट्रम्प के इस हस्तक्षेप ने अमेरिकी मीडिया में व्यापक चर्चा को जन्म दिया। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रम्प प्रशासन के सहयोगियों, जैसे एंड्र्यू जियुलियानी और हावर्ड लुटनिक, ने कई दिनों तक फिफा को दबाव बनाया। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी सार्वजनिक तौर पर लाल कार्ड को रद्द करने की मांग की। यह कदम 2020 के चुनाव में ट्रम्प के बार-बार दावे के साथ तुलना किया गया, जहाँ उन्होंने चुनाव को "धोखा" कहा था।
फिफा और बेल्जियम फुटबॉल संघ की प्रतिक्रिया
फिफा ने कहा कि डिसिप्लिनरी कमेटी ने नियमों के आधार पर निर्णय लिया है और बॉलोगन को एक साल के प्रोबेशन पर रखा गया है। वहीं बेल्जियम फुटबॉल संघ ने इस निर्णय को चुनौती दी, यह कहते हुए कि "खेल की नैतिकता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और फुटबॉल के मूल सिद्धांतों की रक्षा के लिए हम संघर्ष जारी रखेंगे।"
यह मामला दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय खेल नियमों पर राजनीतिक हस्तक्षेप कितनी जटिल और संवेदनशील हो सकता है, और यह भविष्य में फिफा की नियामक स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।