पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में सार्वजनिक हित की याचिका दायर की गई है, जिसमें डिलजीत दोजन की फ़िल्म ‘सतलुज’ को ज़ी5 पर पुनः उपलब्ध कराने की मांग की गई है। यह कदम फ़िल्म के अचानक हटाव और कथित सुरक्षा कारणों पर सवाल उठाता है।
डिलजीत दोजन की नवीनतम फ़िल्म सतलुज, जो जासवंत सिंह खलरा की जीवन कहानी पर आधारित है, को 3 जुलाई को ज़ी5 पर रिलीज़ होने के बाद मात्र 48 घंटे में प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया गया। इस अनपेक्षित हटाव के जवाब में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में एक सार्वजनिक हित की याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसका उद्देश्य फ़िल्म को फिर से उपलब्ध कराना है।
पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की रक्षा
याचिका दायर करने वाले शरवन सिंह, एक ज़ी5 ग्राहक, ने दावा किया है कि फ़िल्म का हटाव संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि क्यों बिना किसी सार्वजनिक विवरण या स्पष्ट कानूनी आधार के फ़िल्म को हटाया गया। न्यायालय से यह अपेक्षा की जा रही है कि ज़ी5 और संबंधित प्राधिकरण अपनी निर्णय प्रक्रिया को स्पष्ट करें।
सुरक्षा चिंता और CBFC का रोल
स्रोतों के अनुसार, केंद्रीय सरकार ने “सुरक्षा कारणों” और सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडिएरी गाइडलाइन्स और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 के तहत ज़ी5 को फ़िल्म हटाने का निर्देश दिया। यह विवाद 2022 से शुरू हुआ जब फ़िल्म को मूल शीर्षक पंजाब 95 के तहत केंद्रीय बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) में जमा किया गया था। बोर्ड द्वारा सुझाए गए 127 कट्स को निर्माता ने अस्वीकार कर दिया, जिससे प्रमाणन प्रक्रिया स्थगित रही। बाद में, फ़िल्म को नया नाम देकर ओटीटी पर रिलीज़ किया गया, जिसे CBFC के अधिकार क्षेत्र से बाहर माना जाता है।
सिख संगठनों की प्रतिक्रिया
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति (DSGMC) ने हटाव के विरोध में सार्वजनिक स्क्रीनिंग की माँग की है, यह कहते हुए कि फ़िल्म जासवंत सिंह खलरा की कहानी को दबाने का प्रयास है। वे मानते हैं कि यह फ़िल्म एक ऐतिहासिक सत्य को उजागर करती है जो पंजाब के अंधेरे दौर को दर्शाती है।
समुदाय स्क्रीनिंग और पायरसी
फ़िल्म के हटने के बाद, कई दर्शक और अभिनेता, जैसे सुभिंदर विंकी, ने डाउनलोड की गई प्रतियों का उपयोग करके ग्रामीण क्षेत्रों में स्क्रीनिंग की सूचना दी। साथ ही, फ़िल्म की पायरेटेड कॉपीज़ ऑनलाइन भी फैल रही हैं, जो इस मुद्दे को और जटिल बना रही हैं।
सारांश और भविष्य की दिशा
सतलुज को लेकर उठी यह बहस न केवल फ़िल्मी दुनिया में बल्कि मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक विमर्श को भी प्रभावित कर रही है। यदि उच्च न्यायालय इस PIL को स्वीकार करता है, तो यह भारतीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सामग्री नियंत्रण के मानदंडों को पुनः परिभाषित करने का संकेत हो सकता है।