पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल की कीमतें आसमान छू गईं, फिर भी भारत ने आपूर्ति श्रृंखला को विविधित करके कीमतों को नियंत्रित किया। इस लेख में बताया गया है कि कैसे नीति‑निर्माण, रणनीतिक साझेदारियाँ और सरकारी समन्वय ने देश को आर्थिक झटकों से बचाया।

पश्चिम एशिया में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता पैदा की, जिससे कई देशों को ऊर्जा‑आधारित आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। भारत, जो विश्व का तीसरा बड़ा कच्चे तेल आयातकर्ता है, ने इस चुनौती को पार कर दिखाया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा केवल संधियों पर नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक उपायों पर आधारित है।

इतिहासिक पृष्ठभूमि और संभावित जोखिम

1973 के तेल प्रतिबंध और 1991 की भुगतान संतुलन crisis ने भारत को कच्चे तेल की अत्यधिक आयात निर्भरता के जोखिम की तीक्ष्ण याद दिलाई। तब से, भारत ने निरंतर आयात‑आधारित मॉडल को चुनौती देने के लिए विविधीकरण की राह अपनाई, लेकिन हॉर्मुज़ संकट ने इस नीति की परीक्षा को तेज़ कर दिया।

संख्याओं में स्पष्ट अंतर

संकट के दौरान, भारत में पेट्रोल की कीमतें केवल 7.5 % बढ़ीं, जबकि जर्मनी 14 %, यूके 19 % और अमेरिका 45 % तक बढ़े। डीज़ल में वृद्धि 8 % रही, जबकि यूएई 85 % तक पहुंच गई। इसी तरह, घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें पाकिस्तान और फिलीपींस जैसे देशों की तुलना में बहुत कम रही। यह अंतर दर्शाता है कि भारत ने कीमत‑शॉक को घरेलू उपभोक्ता तक पूरी तरह नहीं पहुँचने दिया।

स्ट्रेटेजिक कदमों की भूमिका

भारत की सफलता चार मुख्य स्तंभों पर आधारित थी: 1. कूटनीतिक संबंध – ईरान और खाड़ी देशों के साथ कई दशकों की साझेदारी ने संकट के समय ऊर्जा प्रवाह को सुनिश्चित किया; 2. आपूर्तिकर्ता विविधीकरण – रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से ऊर्जा समझौते भारत को एक ही बास्केट पर निर्भरता से बाहर निकाले; 3. दीर्घकालिक ऊर्जा योजना – एथेनॉल ब्लेंडिंग, नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार, रणनीतिक भंडारण और रिफाइनरी क्षमता में निवेश ने आर्थिक लचीलापन बढ़ाया; 4. समन्वित सरकारी कार्रवाई – विदेश, पेट्रोलियम, बंदरगाह, नौसेना और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने मिलकर जोखिम निगरानी और लॉजिस्टिक प्रबंधन किया।

आर्थिक लागत और सामाजिक लाभ

सरकारी तेल कंपनियों ने जून 2026 तक पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी बिक्री पर लगभग ₹74,781 crore का नुकसान उठाया। हालांकि, यह खर्च उपभोक्ता मूल्य वृद्धि को रोकने और घरों की ख़र्ची पर दबाव को कम करने के लिए आवश्यक था। इस प्रकार, सरकार ने अल्पकालिक वित्तीय बोझ को सामाजिक स्थिरता के पक्ष में प्राथमिकता दी।

भविष्य के लिए सीख

हॉर्मुज़ संकट ने यह सिद्ध कर दिया कि ऊर्जा सुरक्षा अब केवल भौगोलिक संसाधनों पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक लचीलापन, आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण और सरकारी समन्वय पर निर्भर है। भारत का मॉडल अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक उदाहरण बन सकता है, जहाँ नीति‑निर्माता को दीर्घकालिक रणनीति और तत्काल आर्थिक संरक्षण दोनों को संतुलित करना होगा।