यूएस के साथ व्यापार में भारत का वार्षिक अधिशेष $42 बिलियन है, जबकि ईयू, यूके और जापान के संयुक्त सौदों से केवल $12 बिलियन। लेख में बताया गया है कि भारत को क्यों यूएस के साथ व्यापक व्यापार समझौते पर प्राथमिकता देनी चाहिए और वर्तमान सौदों की सीमाएँ क्या हैं।

भारत की व्यापार नीति पर वर्तमान चर्चा अक्सर ईयू, यूके और जापान के साथ हुए ‘उत्सव’ सौदों पर केंद्रित रहती है, परन्तु आंकड़े एक अलग कहानी बताते हैं। 2020‑25 के दौरान अमेरिका के साथ भारत का माल व्यापार अधिशेष लगभग $42 बिलियन रहा, जबकि इन तीन बड़े साझेदारों के साथ संयुक्त अधिशेष मात्र $12 बिलियन था। यह 4:1 का अनुपात स्पष्ट करता है कि यूएस भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साथी है, और फिर भी कोई औपचारिक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) नहीं हुआ है।

यूएस के साथ व्यापार का महत्व

भारत के फॉर्मूला फ़ार्मास्यूटिकल्स, सॉफ्टवेयर‑संबंधित इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली और कुशल श्रम‑गहन वस्तुएँ अमेरिका में उच्च मांग का स्रोत हैं। इन क्षेत्रों पर शून्य या न्यूनतम टैरिफ लागू करने वाला एक व्यापक FTA न केवल $42 बिलियन के अधिशेष को स्थिर करेगा, बल्कि भारत के आईटी और प्रोफेशनल सेवाओं के लिए भी नए बाजार खोलेगा। यह केवल माल व्यापार नहीं, बल्कि सेवाओं का भी विस्तार है।

ईयू, यूके और जापान के सौदों की सीमाएँ

ईयू के साथ FTA के बावजूद, टेलरिंग, टेक्सटाइल्स और ज्वेलरी पर 9‑12% टैरिफ अभी भी मौजूद हैं, जबकि वियतनाम जैसे देश शून्य टैरिफ का लाभ उठा रहे हैं। यूके के CETA से 99% निर्यात पर टैरिफ हटाने के बावजूद, भारत का यूके के साथ वार्षिक अधिशेष केवल $5 बिलियन है। जापान के CEPA ने टैरिफ हटाए, परन्तु नॉन‑टैरिफ अवरोधों के कारण व्यापार संतुलन अभी भी घाटे में है।

चीन का प्रभाव और भविष्य की दिशा

चीन के साथ 2024‑25 में व्यापार घाटा $99 बिलियन तक पहुँच गया, जिसमें आय $113 बिलियन और निर्यात मात्र $14 बिलियन थे। ईयू, यूके और जापान के संयुक्त अधिशेष इस घाटे का केवल 8% भी नहीं कवर कर सकता। इस परिप्रेक्ष्य में, यूएस के साथ एक व्यापक FTA न केवल मौजूदा अधिशेष को बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति को भी सुदृढ़ करेगा।

निष्कर्ष

भारत का व्यापार नीति दृष्टिकोण ‘सही’ सौदों पर आधारित नहीं है, बल्कि वह उन सौदों पर केंद्रित है जो सबसे बड़े आर्थिक लाभ प्रदान कर सकते हैं। यूएस के साथ एक संतुलित FTA, जिसमें माल और सेवाएँ दोनों शामिल हों, वह सबसे प्रभावशाली समझौता होगा जो भारत ने कभी किया है, और यह उसके बाज़ार‑उन्मुख विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाएगा।