भारत का पावर मंत्रालय एल नीनो के कारण संभावित मौसम‑विचलन से निपटने के लिए एक विस्तृत सलाह जारी करने की तैयारी कर रहा है। इस सलाह में थर्मल प्लांट, जल उपलब्धता और ट्रांसमिशन सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।

नई दिल्ली – जलवायु की अनिश्चितता के कारण भारत की ऊर्जा प्रणाली को संभावित जोखिमों से बचाने के उद्देश्य से पावर मंत्रालय ने एक विस्तृत सलाह तैयार करने का निर्णय लिया है। यह कदम मंत्रालय द्वारा गुरुवार को आयोजित समीक्षा बैठक के बाद आया, जिसमें एल नीनो के प्रभावों को सीमित करने के लिए कई प्राविधिक उपायों पर चर्चा हुई।

पृष्ठभूमि एवं मौसमी चुनौती

एल नीनो, जो कि प्रशांत महासागर में समुद्री सतह तापमान में असामान्य वृद्धि लाता है, भारत में मानसून की अनियमितता, जल स्तर में गिरावट और पवन‑ऊर्जा उत्पादन में कमी का कारण बन सकता है। पिछले दो दशकों में इसी तरह की घटनाओं ने हाइड्रोपावर और पवन ऊर्जा के उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया था, जिससे ग्रिड पर कोयला‑आधारित उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव आया।

सलाह में प्रमुख बिंदु

मंत्रालय की सलाह में चार मुख्य क्षेत्रों पर प्रकाश डाला गया है: 1. थर्मल प्लांटों के लिए कोयला और जल स्टॉक सुनिश्चित करना, 2. नियोजित मेंटेनेंस के माध्यम से अनिवार्य बंद‑बंद और आंशिक आउटेज को कम करना, 3. ट्रांसमिशन नेटवर्क के संवेदनशील घटकों की पहचान और संरक्षण, तथा 4. कृषि‑लोड को सौर‑ऊर्जा के पीक घंटों में स्थानांतरित करना।

थर्मल प्लांटों की तैयारी

राज्य सरकारों से अनुरोध किया जाएगा कि वे कोयले की उपलब्धता और जल आपूर्ति में सहायता करें, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ वर्षा की कमी से जलाशयों का स्तर घट रहा है। साथ ही, उच्च मांग के समय में अनावश्यक बंद‑बंद को रोकने के लिए नियोजित रखरखाव कार्य तेज़ किया जाएगा।

ट्रांसमिशन सुरक्षा

जनरेटिंग कंपनियों और ट्रांसमिशन यूटिलिटीज़ को उन ट्रांसमिशन लाइनों, ट्रांसफॉर्मरों और नेटवर्क घटकों की सूची तैयार करने का निर्देश दिया जाएगा, जो भारी लोड या ओवरलोड के जोखिम में हैं। इससे पहले से ही पूर्व‑सावधानी उपाय लागू कर संभावित ब्रेकडाउन को रोका जा सकेगा।

संभावित प्रभाव और चुनौतियाँ

यदि हाइड्रो और पवन उत्पादन में गिरावट आती है, तो ग्रिड को कोयला‑आधारित उत्पादन पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि का जोखिम बढ़ेगा। इस परिप्रेक्ष्य में, मंत्रालय ने सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई है, ताकि दिन के उजाले के दौरान कृषि‑लोड को शिफ्ट किया जा सके।

हालाँकि, जल की कमी, कोयला की सप्लाई श्रृंखला में बाधाएँ और राज्य‑स्तर पर समन्वय की कमी जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। इन मुद्दों को संबोधित करने के लिए निरंतर मॉनिटरिंग और त्वरित राहत उपायों की आवश्यकता होगी।

इस सलाह के जारी होने के बाद, पावर मंत्रालय की अपेक्षा है कि सभी हितधारक—राज्य लोड डिस्पैच सेंटर, ट्रांसमिशन कंपनियां और जनरेटिंग यूनिट्स—एकजुट होकर जलवायु‑संबंधी जोखिमों को न्यूनतम करेंगे और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाएंगे।