जानिए कैसे विदेशों में फेंके गए कपड़े हरियाणा के पानीपत से होते हुए दिल्ली के प्रसिद्ध सरोजिनी नगर बाजार में मात्र ₹150 में बिकने के लिए पहुंचते हैं। यह वैश्विक रीसाइक्लिंग उद्योग का एक अद्भुत उदाहरण है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • हरियाणा का पानीपत दुनिया भर के पुराने और फेंके गए कपड़ों का सबसे बड़ा रीसाइक्लिंग हब है।
  • दिल्ली के सरोजिनी नगर में बिकने वाले सस्ते जीन्स विदेशों से आयात होकर एक लंबी प्रक्रिया से गुजरते हैं।
  • यह पूरी व्यवस्था पर्यावरण अनुकूल रीसाइक्लिंग और फास्ट-फैशन के कचरे के दोहरे पहलू को दर्शाती है।

दिल्ली का सरोजिनी नगर बाजार अपने बेहद सस्ते और ट्रेंडी कपड़ों के लिए देश भर में मशहूर है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वहां मिलने वाली मात्र ₹150 की जीन्स का सफर कहां से शुरू होता है? यह सफर जितना स्थानीय लगता है, उतना ही यह वैश्विक है। इसकी शुरुआत अक्सर अमेरिका, यूरोप या जापान के किसी नागरिक की अलमारी से होती है, जो इस्तेमाल के बाद इसे दान या कचरे में दे देता है। वहां से यह कपड़ा समुद्र के रास्ते भारत के हरियाणा राज्य में स्थित पानीपत पहुंचता है।

पानीपत: दुनिया के फेंके गए कपड़ों की राजधानी

हरियाणा का ऐतिहासिक शहर पानीपत केवल अपने बुनकरों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े 'कास्ट-ऑफ कैपिटल' (फेंके गए कपड़ों की राजधानी) के रूप में भी जाना जाता है। यहां हर दिन विदेशों से सैकड़ों टन पुराने और रिजेक्टेड कपड़े आयात किए जाते हैं। पानीपत के विशाल रीसाइक्लिंग उद्योगों में इन कपड़ों की कड़ाई से छंटनी की जाती है। जो कपड़े बहुत अधिक फटे-पुराने होते हैं, उन्हें मशीनों में डालकर धागा (शॉडी यार्न) बनाया जाता है, जिससे कंबल और दरियां बनती हैं। लेकिन जो कपड़े थोड़ी बेहतर स्थिति में होते हैं, उन्हें रीफर्बिशिंग के लिए अलग कर लिया जाता है।

सस्ते फैशन का अर्थशास्त्र और जुगाड़

इन अलग किए गए कपड़ों को स्थानीय कारीगरों द्वारा सुधारा जाता है। यदि किसी जीन्स का बटन टूटा है, चेन खराब है या उस पर कोई दाग है, तो उसे पानीपत के कारखानों में धोया, सुधारा और नया जैसा बनाया जाता है। भारत में सस्ते श्रम और कुशल कारीगरों की उपलब्धता के कारण इस पूरी प्रक्रिया की लागत बेहद कम आती है। इसके बाद, इन कपड़ों को थोक भाव पर दिल्ली के सरोजिनी नगर, जनपथ और करोल बाग जैसे बाजारों में भेज दिया जाता है। इस तरह, जो जीन्स कभी न्यूयॉर्क के किसी मॉल में हजारों रुपये में बिक रही थी, वह दिल्ली की पटरियों पर ₹150 में उपलब्ध हो जाती है।

पर्यावरण और फास्ट-फैशन का वैश्विक संकट

यह पूरी प्रक्रिया केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे पर्यावरणीय निहितार्थ भी हैं। एक तरफ, पानीपत का यह उद्योग लाखों टन कपड़ा कचरे को लैंडफिल (कचरे के पहाड़ों) में जाने से बचाता है, जो कि पर्यावरण के अनुकूल है। दूसरी तरफ, यह इस बात का भी प्रमाण है कि विकसित देशों में 'फास्ट-फैशन' के कारण किस कदर कपड़ा कचरा पैदा हो रहा है। उपभोक्तावाद की इस दौड़ में कपड़े इतनी तेजी से खरीदे और फेंके जा रहे हैं कि विकासशील देश अब उनके कचरे को खपाने का जरिया बनते जा रहे हैं।