सेबी ने अपने बोर्ड सदस्यों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए विस्तृत हितसंघर्ष ढांचा तैयार किया, जिसमें दो‑साल की कूल‑ऑफ़ अवधि और परिवार के निवेश पर प्रतिबंध शामिल है। ये कदम बाजार में पारदर्शिता, नैतिक मानकों और शासन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से उठाए गए हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सेबी ने कर्मचारियों के लिए कड़े हितसंघर्ष नियम लागू किए।
  • परिवार के सदस्यों पर भी ‘नॉन‑परमिटेड’ निवेश प्रतिबंध लगाया गया।
  • रिटायरमेंट या इस्तीफ़ा के बाद दो साल तक नियामक के सामने प्रतिनिधित्व निषिद्ध।

भारत के प्रमुख बाजार नियामक सेबी ने अपने कर्मचारियों, बोर्ड सदस्यों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए एक व्यापक हितसंघर्ष नियमावली प्रकाशित की। यह परिवर्तन पिछले वर्षों में कुछ विवादों, विशेषकर पूर्व चेयरपर्सन माधवी पुरी बुख के खिलाफ हेंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद किया गया, जिससे नियामक ने अपनी नीतियों की पुनः समीक्षा करने का फैसला किया।

पृष्ठभूमि और नियामक की प्रतिक्रिया

माधवी पुरी बुख पर लगाए गए आरोपों को भारत के भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकरण ने बाद में खारिज कर दिया था, परंतु सार्वजनिक भरोसे को पुनर्स्थापित करने के लिए सेबी ने एक विस्तृत फ्रेमवर्क तैयार किया। बोर्ड ने पिछले महीने इस फ्रेमवर्क को मंजूरी दी, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों के लिए स्वैच्छिक कठोर आचार संहिता अपनाने की व्यवस्था शामिल है।

नए नियमों का मुख्य सार

नियमों के तहत, सेबी से बाहर होने वाले कर्मचारियों को दो साल की कूल‑ऑफ़ अवधि में नियामक के सामने किसी भी पक्ष का प्रतिनिधित्व करने से प्रतिबंधित किया गया है। साथ ही, कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों को “नॉन‑परमिटेड” निवेश—जैसे इक्विटी शेयर, इक्विटी में परिवर्तनीय उपकरण और डेरिवेटिव्स—से बचने का निर्देश दिया गया है। केवल पेशेवर रूप से प्रबंधित पूल्ड इन्वेस्टमेंट वाहन, इन्भिट्स और रीट्स में निवेश की अनुमति है, तथा एक कर्मचारी की कुल निवेश पोर्टफोलियो में इन उपकरणों का हिस्सा 25 % से अधिक नहीं होना चाहिए।

प्रभाव और अनुपालन

यदि किसी कर्मचारी या उसके परिवार के साथ मिलकर 20 लाख रुपये से अधिक का नॉन‑परमिटेड निवेश या कुल पोर्टफोलियो का 5 % से अधिक हिस्सा हो, तो उसे हितसंघर्ष माना जाएगा। ऐसे मामलों में कर्मचारी को स्वयं को मामले से हटाना (recuse) अनिवार्य है और ओएफ़सी (Office of Ethics and Compliance) को तुरंत सूचित करना होगा। नियामक ने एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म भी तैयार किया है, जहाँ सभी हितसंघर्ष खुलासे दर्ज होंगे।

भविष्य की दिशा

इन बदलावों से सेबी की पारदर्शिता और नैतिक मानकों को सुदृढ़ करने की उम्मीद है, परन्तु नियमों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखेगा जब उनका कड़ाई से पालन और निगरानी सुनिश्चित की जाएगी। बाजार सहभागियों को अब इन नई शर्तों के अनुसार अपने निवेश पोर्टफोलियो का पुनर्मूल्यांकन करना होगा, जिससे भारतीय शेयर बाजार में विश्वास की नई लहर आ सकती है।