पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण भारतीय रुपया लगातार चौथे दिन गिरकर 96.33 पर बंद हुआ।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 8 पैसे गिरकर 96.33 पर बंद हुआ।
  • पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने दबाव बढ़ाया।
  • विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा इक्विटी की बिकवाली से मुद्रा पर असर पड़ा।
  • डॉलर इंडेक्स में मजबूती और वैश्विक अनिश्चितता बनी हुई है।

भारतीय मुद्रा, रुपया, लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज करते हुए गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 8 पैसे फिसलकर 96.33 (अनंतिम) पर बंद हुआ। यह गिरावट वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक संकट के बीच अमेरिकी डॉलर की मजबूती के कारण देखी गई है।

भू-राजनीतिक संकट और कच्चे तेल का प्रभाव

पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है। विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास सुरक्षा संबंधी खतरों ने कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भर है, इसलिए तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि भी रुपये पर भारी दबाव डालती है। वर्तमान में ब्रेंट क्रूड की कीमतें अस्थिर बनी हुई हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है।

FII की बिकवाली और बाजार की स्थिति

मुद्रा बाजार के विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारतीय बाजारों से लगातार पूंजी निकालने (Outflows) ने रुपये की स्थिति को और कमजोर कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, बुधवार को FII ने घरेलू इक्विटी बाजार में लगभग ₹735.83 करोड़ की बिकवाली की थी। इस बड़े पैमाने पर बिकवाली ने घरेलू मुद्रा की मांग को कम कर दिया है।

विशेषज्ञों का विश्लेषण और भविष्य का अनुमान

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में शांति स्थापित नहीं होती, तब तक रुपये पर नकारात्मक दबाव बना रह सकता है। हालांकि, यदि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में हस्तक्षेप करता है, तो रुपये की गिरावट को कुछ हद तक रोका जा सकता है। निवेशकों की नजर अब अमेरिका के आगामी आर्थिक डेटा, जैसे कि खुदरा बिक्री और बेरोजगारी दावों पर टिकी है, जो डॉलर की भविष्य की दिशा तय करेंगे।