भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने रिलायंस जियो इन्फोकॉम और कई अन्य कंपनियों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी व्यवहार के आरोपों को बिना सबूत के बताते हुए खारिज कर दिया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • CCI ने रिलायंस जियो और अन्य कंपनियों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी व्यवहार की शिकायतों को खारिज कर दिया है।
  • आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता ने आरोपों की पुष्टि के लिए कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किए।
  • सिर्फ रिचार्ज प्लान या टैरिफ में समानता को मिलीभगत का आधार नहीं माना जा सकता।
  • CCI ने 4,500 से अधिक फर्मों के खिलाफ इसी तरह के आरोपों को पहले भी खारिज किया है।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड और अन्य प्रमुख उद्यमों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी व्यवहार के आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप केवल अनुमानित और सामान्य प्रकृति के थे, जिनमें ठोस साक्ष्यों का पूर्ण अभाव था।

आरोपों का आधार और कानूनी पहलू

शिकायतकर्ता ने प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 3 और 4 के उल्लंघन का आरोप लगाया था। धारा 3 प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौतों से संबंधित है, जबकि धारा 4 बाजार में प्रभुत्व के दुरुपयोग (Abuse of Dominant Position) से संबंधित है। आरोपों में टेलीकॉम, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा, एफएमसीजी (FMCG) और स्वास्थ्य सेवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में मूल्य निर्धारण में हेरफेर, बहिष्कार की प्रथाओं और आपूर्ति श्रृंखला में समन्वय के माध्यम से मुक्त प्रतिस्पर्धा को बाधित करने की बात कही गई थी।

CCI का तर्क और अवलोकन

नियामक ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता यह बताने में विफल रहा कि संबंधित कंपनियों की विशिष्ट भूमिका क्या थी। आयोग ने पाया कि मिलीभगत या समन्वित व्यवहार के दावों के समर्थन में कोई भी महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्य जैसे कि माल ढुलाई के कोटेशन, चालान (Invoices), बोली दस्तावेज या पत्राचार प्रस्तुत नहीं किया गया था।

टेलीकॉम सेक्टर पर विशेष टिप्पणी

विशेष रूप से टेलीकॉम क्षेत्र पर टिप्पणी करते हुए, CCI ने कहा कि एक ओलिगोपॉलीस्टिक (Oligopolistic) बाजार में, जहां कुछ ही बड़े खिलाड़ी मौजूद हों, प्रीपेड टैरिफ प्लान, वैधता अवधि या रिचार्ज मूल्य में समानता का होना अपने आप में किसी प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौते का संकेत नहीं हो सकता है। आयोग ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस आधार के 'रोविंग और फिशिंग इंक्वायरी' (बिना किसी ठोस कारण के व्यापक जांच) शुरू नहीं की जा सकती।

यह फैसला उन हजारों कंपनियों के लिए एक राहत के रूप में देखा जा रहा है जिनके खिलाफ इसी तरह के निराधार आरोप लगाए गए थे। CCI ने उल्लेख किया कि उसने विभिन्न क्षेत्रों में 4,500 से अधिक फर्मों के खिलाफ इसी तरह के आरोपों को पहले भी खारिज किया है।