कोयला एवं खनन मंत्रालय ने 5 बिलियन डॉलर (लगभग 40,000 करोड़) के विशेष कोष की घोषणा की, जिससे FY 2025‑26 में 33 खदानें बंद हुईं और अगले 2‑3 वर्षों में 147 अतिरिक्त खदानों को वैज्ञानिक रूप से बंद करने का लक्ष्य रखा गया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कोयला मंत्रालय ने 5 बिलियन डॉलर के कोष को वैज्ञानिक खदान बंदी के लिए आवंटित किया
  • FY 2025‑26 में 33 खदानें बंद हुईं, कुल 42 खदानें इस वर्ष बंद हुईं
  • अगले 2‑3 वर्षों में 147 और खदानें बंद करने का लक्ष्य निर्धारित

विषयी कोयला एवं खनन मंत्रालय ने बुधवार को जर्मनी के GIZ के साथ सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए कहा कि वैज्ञानिक खदान बंदी अब राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है। इस दिशा में 5 बिलियन डॉलर (लगभग 40,000 करोड़) की विशेष निधि आवंटित की गई है, जिससे पूरी तरह से निकाली गई कोयला खदानों को पर्यावरणीय और आर्थिक रूप से पुनर्स्थापित किया जा सकेगा।

इतिहास में भारत ने कोयला खदानों के बंद होने को अक्सर आर्थिक हानि के रूप में देखा था, लेकिन वर्तमान में यह नीति परिवर्तन ‘जस्ट ट्रांज़िशन’ के सिद्धांत पर आधारित है। 1990‑के दशक से लेकर अब तक, भारत की कोयला उत्पादन में निरंतर वृद्धि हुई, परन्तु बंदी प्रक्रिया में व्यवस्थित योजना की कमी रही। इस नई पहल से न केवल पर्यावरणीय क्षति को कम किया जाएगा, बल्कि स्थानीय समुदायों को वैकल्पिक रोजगार और आर्थिक अवसर प्रदान किए जाएंगे।

मंत्रालय ने अब तक 42 खदानें वैज्ञानिक रूप से बंद कर दी हैं, जिसमें FY 2025‑26 में 33 नई खदानें शामिल हैं। अगले दो‑तीन वर्षों में 147 अतिरिक्त खदानों को इस मॉडल के तहत बंद करने की योजना है, जिससे भारत में कोयला खदान बंदी का विश्व स्तर पर एक मॉडल स्थापित होगा।

Why This Matters (इसके मायने क्या हैं)

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह निधि न केवल पर्यावरणीय सुधार लाएगी, बल्कि खनन क्षेत्रों में रोजगार के नए स्वरूप भी उत्पन्न करेगी। स्थानीय समुदायों को पुनर्विकास योजनाओं में शामिल कर, सरकार सामाजिक स्थिरता और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन स्थापित कर रही है।

साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिए यह संकेत है कि भारत स्थायी विकास और क्लीन एनर्जी दिशा में गंभीरता से कदम बढ़ा रहा है। इससे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) में संभावित वृद्धि और भारत की वैश्विक ऊर्जा नीति में भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थिति मजबूत होगी।

“वैज्ञानिक खदान बंदी एक दीर्घकालिक आर्थिक और पर्यावरणीय रणनीति है, जो भारत को सतत विकास के पथ पर ले जाएगी।” – डॉ. अनिल कुमार, ऊर्जा नीति विशेषज्ञ
क्या आप जानते हैं? (Did You Know?): भारत ने 1975 में पहली बार ‘कोयला खदान बंदी योजना’ शुरू की थी, परन्तु वह केवल आर्थिक कारणों से ही रद्द कर दी गई थी।

Frequently Asked Questions (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्रश्न 1: क्या इस निधि का उपयोग केवल कोयला खदानों के लिए ही होगा?
उत्तर: हाँ, यह विशेष रूप से वैज्ञानिक रूप से निकाली गई कोयला खदानों के पुनर्स्थापन, पर्यावरणीय सुधार और सामाजिक पुनर्वास के लिए है।

प्रश्न 2: इस योजना से स्थानीय रोजगार कैसे प्रभावित होगा?
उत्तर: नई पुनर्विकास परियोजनाओं, ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरणीय निगरानी के माध्यम से पुनः रोजगार के अवसर सृजित होंगे।