पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के कारण मंगलवार को शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में गिरावट दर्ज की गई।
- BSE सेंसेक्स 278.32 अंक गिरकर 77,450.64 पर आ गया।
- NSE निफ्टी 57.65 अंक फिसलकर 24,230.45 पर रहा।
- ईरान-अमेरिका तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड $91.46 प्रति बैरल तक पहुंचा।
- अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड बढ़कर 4.73% हो गई, जिससे FII निवेश प्रभावित हुआ।
मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को भारतीय शेयर बाजारों ने कमजोर शुरुआत की। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ने निवेशकों की धारणा को बुरी तरह प्रभावित किया है। BSE सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में 278.32 अंक गिरकर 77,450.64 पर आ गया, जबकि NSE निफ्टी 57.65 अंक गिरकर 24,230.45 पर रहा।
बाजार में इस गिरावट का मुख्य कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में वृद्धि है, जो अब $91.46 प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए तेल की कीमतों में कोई भी बढ़ोतरी सीधे तौर पर मुद्रास्फीति (Inflation) को बढ़ाती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव डालती है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते विवाद ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है।
इसके अलावा, अमेरिकी बाजार के संकेतों ने भी भारतीय निवेशकों को चिंतित किया है। अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड बढ़कर 4.73% हो गई है। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश करना पसंद करते हैं। आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को FIIs ने 2,535.10 करोड़ रुपये की इक्विटी बेची।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय बाजार वर्तमान में भू-राजनीतिक अस्थिरता और पश्चिमी देशों में मौद्रिक सख्ती के दोहरे दबाव में है। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था बुनियादी तौर पर मजबूत है, लेकिन तेल आयात पर निर्भरता सेंसेक्स को पश्चिम एशिया के किसी भी तनाव के प्रति संवेदनशील बनाती है। रिलायंस इंडस्ट्रीज और एक्सिस बैंक जैसे शेयरों में बढ़त यह दर्शाती है कि निवेशक अब चुनिंदा वैल्यू स्टॉक्स की ओर रुख कर रहे हैं।
"ईरान तनाव के कारण ब्रेंट का $91 के करीब पहुंचना निवेशकों के बीच सावधानी का माहौल बनाए हुए है। वॉल स्ट्रीट ने भी इसी सतर्कता को दोहराया है।" - राजेश पलविया, रिसर्च हेड, एक्सिस डायरेक्ट।
वैश्विक स्तर पर भी यही स्थिति देखी गई। जापान का निक्केई 225 और दक्षिण कोरिया का कोस्पी भी गिरावट के साथ कारोबार कर रहे थे। यह संकेत देता है कि वैश्विक स्तर पर निवेशकों में जोखिम लेने की क्षमता कम हुई है।
| इंडेक्स/एसेट | वर्तमान मूल्य/बदलाव | रुझान |
|---|---|---|
| BSE सेंसेक्स | 77,450.64 (-278.32) | गिरावट |
| NSE निफ्टी | 24,230.45 (-57.65) | गिरावट |
| ब्रेंट क्रूड | $91.46 प्रति बैरल | बढ़त |
| अमेरिकी 10-वर्षीय यील्ड | 4.73% | बढ़त |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें शेयर बाजार को कैसे प्रभावित करती हैं?
तेल महंगा होने से उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे महंगाई बढ़ती है और रुपये की कीमत गिरती है, जिसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे और शेयर कीमतों पर पड़ता है।
2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का FIIs पर क्या प्रभाव पड़ता है?
जब अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों को वहां कम जोखिम में अधिक रिटर्न मिलता है, जिससे वे भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर अमेरिका वापस ले जाते हैं।