कर्नाटक के मांड्या में मानसून की कमी के कारण प्रशासन ने किसानों को धान जैसी लंबी अवधि की फसलों के बजाय रागी और ज्वार जैसी कम पानी वाली फसलों को उगाने का निर्देश दिया है।
- मानसून की कमी के कारण मांड्या में केवल 5% बुवाई पूरी हुई है।
- प्रशासन ने रागी, ज्वार, तिल और मूंग जैसी कम पानी वाली फसलों पर जोर दिया है।
- कावेरी सिंचाई सलाहकार समिति ने पीने के पानी और पशुधन को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है।
कर्नाटक के मांड्या जिले में मानसून की भारी कमी ने कृषि संकट पैदा कर दिया है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के पर्याप्त वर्षा न लाने के कारण, मांड्या के उपायुक्त डॉ. कुमार ने कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे किसानों को कम पानी वाली और कम समय में तैयार होने वाली फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें।
एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान, डॉ. कुमार ने स्पष्ट किया कि वर्षा की कमी के कारण लंबी अवधि की फसलों के लिए पानी की उपलब्धता सीमित रहने की संभावना है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे किसानों को रागी, ज्वार, तिल, लोबिया, उड़द और कुल्थी जैसी अर्ध-शुष्क फसलों की खेती के लिए प्रेरित करें। ये फसलें न केवल कम पानी में जीवित रह सकती हैं, बल्कि इन्हें कम समय में काटा भी जा सकता है, जो वर्तमान जलवायु परिस्थितियों के लिए आदर्श है।
क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि मांड्या जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में पानी का प्रबंधन केवल खेती का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता से जुड़ा है। यदि किसान समय रहते पारंपरिक फसलों (जैसे धान) को छोड़कर वैकल्पिक फसलों को नहीं अपनाते हैं, तो भूजल स्तर में भारी गिरावट और आर्थिक नुकसान तय है।
वर्षा की अनिश्चितता के इस दौर में, फसल विविधीकरण ही किसानों की एकमात्र सुरक्षा कवच है।
कावेरी सिंचाई सलाहकार समिति ने भी कड़े कदम उठाए हैं। समिति ने निर्णय लिया है कि उपलब्ध पानी का उपयोग सबसे पहले पीने के पानी और पशुधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा। लंबी अवधि की फसलों के लिए पानी की आपूर्ति फिलहाल स्थगित कर दी गई है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मांड्या ऐतिहासिक रूप से कावेरी नदी के पानी पर निर्भर रहा है, जो इसे कर्नाटक का एक प्रमुख कृषि केंद्र बनाता है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून के कारण पिछले कुछ वर्षों में जल स्तर में गिरावट देखी गई है, जिससे किसानों को पारंपरिक धान की खेती से हटकर नई तकनीकों और फसलों की ओर बढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
वर्तमान स्थिति यह है कि जिले में केवल 5% बुवाई ही पूरी हो पाई है, क्योंकि वर्षा में 35% की कमी दर्ज की गई है। प्रशासन अब गांवों और तालुकों के स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है ताकि किसानों को सही निर्णय लेने में मदद मिल सके।
Frequently Asked Questions
1. मांड्या में कौन सी फसलें उगाने की सलाह दी गई है?
प्रशासन ने रागी, ज्वार, तिल, लोबिया, उड़द और कुल्थी जैसी कम पानी वाली फसलों की सलाह दी है।
2. पानी के उपयोग को लेकर क्या नया निर्णय लिया गया है?
पानी को प्राथमिकता के आधार पर पीने के पानी और पशुधन के लिए सुरक्षित रखने का निर्णय लिया गया है।