हिमाचल प्रदेश के ऊना में वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी शोध सफल किया है, जहाँ धान की पराली को जलाए बिना उसी के नीचे आलू की खेती की जा सकती है। यह तकनीक पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
- धान की पराली को जलाए बिना उसमें आलू उगाया जा सकता है।
- इस विधि में जुताई, कम सिंचाई और कम मजदूरी की आवश्यकता होती है।
- पराली धीरे-धीरे गलकर खेत के लिए जैविक खाद का काम करती है।
- यह तकनीक प्रदूषण कम करने और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है।
उत्तर भारत में हर साल धान की कटाई के बाद पराली जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन जाता है। लेकिन अब इस समस्या का एक बेहद ही टिकाऊ और लाभदायक समाधान मिल गया है। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में तीन साल के गहन शोध के बाद वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे धान की कटाई के बाद बची हुई पराली में ही आलू की सफल खेती की जा सकती है।
इस नवीन पद्धति में धान की कटाई के बाद नमीयुक्त खेत में बिना जुताई किए आलू के बीजों को जमीन पर रखा जाता है। इसके बाद इन्हें लगभग पौने फीट तक पराली से ढक दिया जाता है। यह पराली न केवल बीजों की सुरक्षा करती है, बल्कि समय के साथ गलकर मिट्टी में प्राकृतिक खाद का काम भी करती है। इस प्रक्रिया से मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यदि इस तकनीक को पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर लागू किया जाता है, तो यह न केवल वायु प्रदूषण को नियंत्रित करेगी, बल्कि किसानों की खेती की लागत में भी भारी कमी लाएगी। पारंपरिक खेती में जहाँ भारी मात्रा में डीजल, मजदूरी और पानी की आवश्यकता होती है, वहीं यह विधि बेहद किफायती है।
पराली को जलाने के बजाय उसे मल्चिंग के रूप में उपयोग करना मिट्टी के स्वास्थ्य और किसान की जेब दोनों के लिए क्रांतिकारी है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम लागत है। जहाँ सामान्य आलू की खेती में बार-बार सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण की आवश्यकता होती है, वहीं इस विधि में मात्र तीन बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है। पराली की परत खरपतवार को उगने से रोकती है, जिससे कीटनाशकों और खरपतवारनाशक के छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती।
Historical Background
पारंपरिक रूप से, धान की कटाई के बाद पराली को खेत से साफ करने का एकमात्र तरीका उसे जलाना रहा है, जिससे जहरीला धुआं निकलता है। हिमाचल के कृषि वैज्ञानिकों ने वर्षों तक मिट्टी की नमी और पराली के अपघटन (decomposition) पर शोध किया, जिससे अंततः यह 'मल्चिंग तकनीक' विकसित हुई।
चौधरी सरवन कुमार कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के विशेषज्ञों के अनुसार, अब इस तकनीक को व्यापक रूप से किसानों तक पहुँचाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी। ऊना की किसान सुरेश कुमारी और रणजीत सिंह जैसे किसानों ने पहले ही इस तकनीक से बेहतर पैदावार प्राप्त कर इसकी सफलता की पुष्टि की है।
Frequently Asked Questions
1. क्या इस विधि में अधिक पानी की आवश्यकता होती है?
नहीं, पारंपरिक विधि की तुलना में इसमें केवल तीन बार ही सिंचाई की आवश्यकता होती है।
2. क्या यह तकनीक पंजाब और हरियाणा के लिए उपयोगी है?
हाँ, यह तकनीक उन राज्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जहाँ पराली जलाने की समस्या सबसे अधिक है।