तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित राजस्व वृद्धि समिति राज्य के वित्तीय भविष्य के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है। यह न केवल राजस्व बढ़ाने बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार राजस्व की परिभाषा बदलने की क्षमता रखती है।
- तमिलनाडु ने राजस्व वृद्धि के लिए मनमोहन सिंह अहलूवालिया की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई है।
- समिति का उद्देश्य कर और गैर-कर राजस्व को मजबूत करना और वित्तीय आत्मनिर्भरता बढ़ाना है।
- लेख राजस्व और ऋण (financing) के बीच के अंतर को स्पष्ट करने की वकालत करता है।
तमिलनाडु सरकार द्वारा एक उच्च स्तरीय राजस्व वृद्धि समिति (Revenue Augmentation Committee) की स्थापना का निर्णय केवल राज्य बजट के लिए अतिरिक्त संसाधन खोजने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। यह तमिलनाडु को कुछ ऐसा करने का अवसर प्रदान करता है जो अभी तक किसी भी भारतीय राज्य ने व्यवस्थित रूप से करने का प्रयास नहीं किया है: राजस्व को परिभाषित करने और प्रबंधित करने के तरीके को आधुनिक बनाना।
मनमोहन सिंह अहलूवालिया की अध्यक्षता वाली इस समिति को अपने-कर (own-tax) और गैर-कर राजस्व को मजबूत करने, राजस्व उछाल (buoyancy) में सुधार करने, लीकेज को रोकने और वित्तीय आत्मनिर्भरता बढ़ाने के उपाय सुझाने का काम सौंपा गया है। तमिलनाडु आर्थिक विकास और सामाजिक विकास में भारत के सबसे मजबूत प्रदर्शन करने वाले राज्यों में से एक रहा है। इन उपलब्धियों को बनाए रखने के लिए एक टिकाऊ राजस्व आधार की आवश्यकता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि तमिलनाडु का 'ओन-टैक्स' राजस्व, जो 2002-03 में GSDP का 9.3% था, गिरकर 2024-25 में लगभग 6.2% रहने का अनुमान है। यह गिरावट राज्य की वित्तीय स्थिति के लिए एक गंभीर चुनौती है। यदि राज्य केवल ऋण लेकर खर्च करता है, तो वह भविष्य की देनदारी बढ़ा रहा है, न कि वास्तविक राजस्व उत्पन्न कर रहा है।
राजस्व और ऋण के बीच का अंतर समझना वित्तीय स्थिरता के लिए अनिवार्य है; ऋण केवल वित्तपोषण है, राजस्व नहीं।
लेख का तर्क है कि भारतीय सार्वजनिक वित्त में 'संसाधन जुटाने' (Resource Mobilisation) की परिभाषा धुंधली हो गई है। इसमें करों के साथ-साथ ऋण, बॉन्ड और संपत्ति के मुद्रीकरण (asset monetisation) को भी शामिल कर लिया जाता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मानकों के अनुसार, ऋण एक वित्तीय देनदारी है, जबकि वास्तविक राजस्व में कर, शुल्क, लाभांश और रॉयल्टी शामिल होनी चाहिए।
ऐतिहासिक संदर्भ और तुलना
तमिलनाडु के राजस्व प्रदर्शन की तुलना अन्य पड़ोसी राज्यों से करना आवश्यक है ताकि संरचनात्मक समस्याओं को समझा जा सके:
| राज्य | ओन-टैक्स राजस्व (GSDP का %) |
|---|---|
| तेलंगाना | 8.2% |
| कर्नाटक | 6.9% |
| तमिलनाडु | 6.2% |
समिति को न केवल राजस्व बढ़ाने पर, बल्कि कर प्रशासन को बेहतर बनाने पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए। GST जानकारी को वाहन और संपत्ति डेटाबेस के साथ जोड़कर कर चोरी को कम किया जा सकता है। साथ ही, गैर-कर राजस्व जैसे कि उपयोगकर्ता शुल्क (user charges) और सार्वजनिक संपत्तियों से मिलने वाले किराए की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।
Frequently Asked Questions
1. राजस्व वृद्धि समिति का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य राज्य के कर और गैर-कर राजस्व को बढ़ाना और वित्तीय प्रबंधन को आधुनिक बनाना है।
2. 'राजस्व' और 'वित्तपोषण' में क्या अंतर है?
राजस्व वह पैसा है जो सरकार को बिना किसी देनदारी के मिलता है (जैसे टैक्स), जबकि वित्तपोषण (जैसे ऋण) वह है जिसे भविष्य में वापस करना पड़ता है।