जलवायु वित्त की बढ़ती जरूरतों और पुराने वैश्विक वित्तीय ढांचे के दबाव के बीच, भारत एक समावेशी और बहुध्रुवीय हरित विकास प्रणाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव आ रहा है, जहाँ अब केवल पश्चिमी देशों का वर्चस्व नहीं रहेगा।
  • भारत 'इंटरनेशनल सोलर अलायंस' जैसे संस्थानों के माध्यम से ग्लोबल साउथ की आवाज बन रहा है।
  • BRICS+ और न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) वैश्विक वित्तीय शक्ति के नए केंद्र बन सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय वित्त की वर्तमान संरचना—जो संस्थानों, नियमों और प्रथाओं का एक जाल है—एक गहरे परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। दशकों तक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक द्वारा संचालित यह प्रणाली विकसित देशों, यानी 'ग्लोबल नॉर्थ' के नियंत्रण में रही है। हालांकि, जैसे-जैसे वैश्विक शक्ति का संतुलन बदल रहा है, पारंपरिक मॉडल पर दबाव बढ़ रहा है। सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और जलवायु संकट की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में यह पुराना ढांचा संघर्ष कर रहा है।

बदलते वैश्विक शक्ति समीकरण: अंतरराष्ट्रीय वित्तीय वास्तुकला अब केवल पश्चिम का क्षेत्र नहीं रह गई है। चीन, ब्राजील और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के उदय ने वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में नए आयाम पेश किए हैं। यह संक्रमण तब और तेज हो गया है जब अमेरिका जैसे पारंपरिक नेतृत्व वाले देश कई वैश्विक प्रतिबद्धताओं से पीछे हट रहे हैं। इस नेतृत्व के शून्य को भरने के लिए एक नए, बहुध्रुवीय क्रम की आवश्यकता है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि वर्तमान बहुपक्षीय विकास बैंक (MDBs) जलवायु वित्त के मामले में पर्याप्त नहीं हैं। अनुमान है कि 2030 तक MDBs विकासशील देशों को केवल 120 बिलियन डॉलर वार्षिक जलवायु वित्त प्रदान कर पाएंगे। भारत इस कमी को दूर करने के लिए एक सेतु के रूप में उभर रहा है, जो निजी पूंजी को जुटाने और जोखिम कम करने के नए तरीके खोज रहा है।

भारत अब केवल वकालत नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य के बुनियादी ढांचे का निर्माण करने वाला एक 'संस्थागत उद्यमी' बन गया है।

भारत का संस्थागत नेतृत्व: भारत ने केवल मांग करने के बजाय 'संस्थागत उद्यमिता' का प्रदर्शन किया है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA), कोअलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) और ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस (GBA) की स्थापना करके, भारत ने ऐसे व्यावहारिक मंच बनाए हैं जो वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ये पहल मौजूदा प्रणालियों को नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत करने के लिए हैं।

BRICS+ और न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका: BRICS+ गठबंधन, जिसमें वैश्विक जीडीपी और जनसंख्या का 40% से अधिक हिस्सा शामिल है, स्थापित वित्तीय पदानुक्रमों को चुनौती देने की क्षमता रखता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) विकास वित्त के लिए एक वैकल्पिक मॉडल पेश करता है। यदि BRICS+ देश NDB को पुनर्वित्त (recapitalize) करते हैं और स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण को बढ़ावा देते हैं, तो यह विकासशील देशों के लिए ऋण की लागत को काफी कम कर सकता है।

Did You Know?: भारत की G20 अध्यक्षता ने 'ग्रीन डेवलपमेंट पैक्ट' को आगे बढ़ाकर बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार की मांग को वैश्विक स्तर पर मजबूती दी।

Frequently Asked Questions

1. ग्लोबल साउथ क्या है?
ग्लोबल साउथ उन विकासशील और कम आय वाले देशों का समूह है जो अक्सर वैश्विक आर्थिक निर्णयों में हाशिए पर रहते हैं।

2. भारत के प्रमुख वैश्विक संस्थान कौन से हैं?
भारत द्वारा समर्थित प्रमुख संस्थानों में इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) और CDRI शामिल हैं।