खाद्य पदार्थों पर स्वास्थ्य चेतावनी लेबल लगाने को लेकर बहस के बीच, नेस्ले ने भारत सरकार से नियमों के निर्माण में शामिल होने का आग्रह किया है। कंपनी का तर्क है कि यह प्रक्रिया वैज्ञानिक होनी चाहिए।
- नेस्ले ने खाद्य लेबलिंग नियमों के निर्माण में उद्योग की भागीदारी की मांग की है।
- सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिका पर भारत सरकार को देरी के लिए फटकार लगाई है।
- विशेषज्ञों का आरोप है कि कंपनियां केवल अपने मुनाफे के लिए नियमों को कमजोर करना चाहती हैं।
- भारत में पैकेज्ड फूड मार्केट का लगभग 80% हिस्सा उच्च वसा, चीनी और नमक वाला है।
भारत में खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग पर स्वास्थ्य चेतावनी लेबल लगाने को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। वैश्विक खाद्य दिग्गज नेस्ले (Nestle) ने केंद्र सरकार से मांग की है कि नए लेबलिंग नियमों को लागू करने से पहले कंपनियों के साथ परामर्श किया जाए। नेस्ले के सीईओ फिलिप नवरतिल (Philipp Navratil) का कहना है कि लेबलिंग प्रक्रिया को पूरी तरह से 'वैज्ञानिक' होना चाहिए और इसमें उद्योग के दृष्टिकोण को शामिल करना आवश्यक है।
यह मांग ऐसे समय में आई है जब भारत सरकार ने पहले भी चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन कोका-कोला (Coca-Cola) और नेस्ले जैसे बड़े उद्योग समूहों के विरोध के बाद इसे फिलहाल टाल दिया गया है। हाल ही में आई रिपोर्टों ने खुलासा किया है कि कंपनियां अक्सर वैश्विक मानकों के बजाय स्थानीय बाजारों के लिए अलग-अलग उत्पाद बनाती हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल लेबलिंग का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य बनाम कॉर्पोरेट लाभ का है। भारत में पैकेज्ड फूड बाजार का आकार 100 अरब डॉलर से अधिक है, और अनुमान है कि लगभग 80% उत्पाद अत्यधिक चीनी, नमक और वसा से भरपूर हैं। यदि कंपनियां नियमों को प्रभावित करने में सफल रहती हैं, तो इसका सीधा असर देश की जीवनशैली और स्वास्थ्य संकट पर पड़ेगा।
नेस्ले की भागीदारी की मांग सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को कमजोर करने का एक स्पष्ट प्रयास है, क्योंकि वे यूरोप में लेबल का उपयोग कर रहे हैं लेकिन भारत में इसका विरोध कर रहे हैं।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई की और सरकार को देरी करने के लिए फटकार लगाई। अदालत ने स्पष्ट रूप से उत्पादों के सामने (front-facing) चेतावनी लेबल लगाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
खाद्य सुरक्षा और लेबलिंग को लेकर भारत में बहस दशकों पुरानी है। FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करता रहा है, लेकिन उद्योग के दबाव और कार्यान्वयन की चुनौतियों के कारण प्रभावी बदलाव आने में देरी हुई है। यूरोप में कई कंपनियां 2013 से ही स्वेच्छा से चेतावनी लेबल का उपयोग कर रही हैं, जो भारतीय बाजार में विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है।
Frequently Asked Questions
1. नेस्ले भारत में नए नियम क्यों चाहता है?
नेस्ले का तर्क है कि कंपनियों को परामर्श दिया जाना चाहिए ताकि नियम वैज्ञानिक रूप से सटीक हों।
2. स्वास्थ्य कार्यकर्ता क्या मांग कर रहे हैं?
स्वास्थ्य कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि कंपनियों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाए ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिल सके।