ज़ी संस्थापक सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवाला मामले में ₹22,000 करोड़ से अधिक के दावों के बदले केवल ₹6.25 करोड़ के भुगतान प्रस्ताव को NCLT की मंजूरी मिल गई है। बैंकों ने आरोप लगाया है कि इस प्रस्ताव को चंद्रा के ही 'संबद्ध पक्षों' के भारी वोट शेयर के दम पर पास किया गया है।
- NCLT ने ₹22,006.57 करोड़ के दावों के बदले केवल ₹6.25 करोड़ के पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी।
- बैंकों का दावा है कि योजना के पक्ष में वोट देने वाली 61.78% हिस्सेदारी चंद्रा के करीबी सहयोगियों की है।
- विपक्षी बैंकों के पास केवल 19.186% वोट शेयर था, जिससे वे योजना को रोकने में विफल रहे।
- सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वे 'संबद्ध पक्ष' की श्रेणी में नहीं आते।
मुंबई स्थित मीडिया दिग्गज ज़ी (Zee) के संस्थापक सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवाला समाधान ने एक नया कानूनी और वित्तीय विवाद खड़ा कर दिया है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने चंद्रा के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसमें लगभग ₹22,006.57 करोड़ के कुल दावों के बदले मात्र ₹6.25 करोड़ का भुगतान करने की बात कही गई है। यह मामला कॉर्पोरेट गवर्नेंस और दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) के तहत वोटिंग अधिकारों की व्याख्या पर बड़े सवाल खड़े करता है।
विवाद की जड़ वोटिंग प्रक्रिया में छिपी है। दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान कुल 23 लेनदारों ने मतदान में भाग लिया। जहाँ बैंकों ने इस योजना का कड़ा विरोध किया, वहीं उनके पास कुल मतदान शक्ति का केवल 19.186% हिस्सा था। इसके विपरीत, योजना के पक्ष में भारी बहुमत (80.814%) मिला, लेकिन बैंकों का आरोप है कि यह बहुमत वास्तविक लेनदारों का नहीं, बल्कि चंद्रा के ही 'संबद्ध पक्षों' (Related Parties) का है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला IBC के तहत 'संबद्ध पक्षों' की परिभाषा और मतदान प्रक्रिया की अखंडता के लिए एक मिसाल बन सकता है। यदि कोई देनदार अपने ही करीबियों के माध्यम से वोटिंग बहुमत हासिल कर लेता है, तो यह वास्तविक लेनदारों के हितों के साथ गंभीर धोखाधड़ी का मामला बन सकता है।
यह मामला दर्शाता है कि कैसे दिवाला प्रक्रिया के तकनीकी पहलुओं का उपयोग करके बड़े ऋणों को न्यूनतम भुगतान पर सेटल किया जा सकता है।
बैंकों, जिनमें HDFC बैंक, LIC हाउसिंग फाइनेंस और केनरा बैंक शामिल हैं, ने तर्क दिया है कि वीणा इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके सहयोगियों (जैसे वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स और लेमोनेड कैपिटल) का वोट शेयर चंद्रा के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। बैंकों का कहना है कि इन संस्थाओं को 'संबद्ध पक्ष' माना जाना चाहिए और उनके वोटों को गिनती से बाहर रखा जाना चाहिए था।
दूसरी ओर, सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनके बयान के अनुसार, जिन संस्थाओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वे 2008-09 में पारिवारिक व्यवसाय विभाजन के दौरान जवाहर गोयल के नियंत्रण में आ गई थीं। चंद्रा के पक्ष का तर्क है कि IBC के नियमों के अनुसार, ये कंपनियां 'संबद्ध संस्थाएं' नहीं हैं और इनका वोटिंग अधिकार पूरी तरह वैध है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
एससेल ग्रुप (Essel Group) पिछले कई वर्षों से वित्तीय संकट और ऋण के बोझ से जूझ रहा है। सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई व्यक्तिगत गारंटी के कारण, उनकी व्यक्तिगत संपत्ति और दिवाला प्रक्रिया अब बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि बैंक अब भी भारी भरकम राशि की वसूली की उम्मीद कर रहे हैं।
Frequently Asked Questions
1. क्या बैंक इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं?
हाँ, बैंक इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय या अपील न्यायाधिकरण में अपील दायर कर सकते हैं यदि वे साबित कर सकें कि मतदान प्रक्रिया में हेरफेर हुआ है।
2. 'संबद्ध पक्ष' (Associate Party) का क्या अर्थ है?
IBC के तहत, यदि कोई इकाई देनदार के नियंत्रण में है या उसके साथ घनिष्ठ व्यावसायिक संबंध रखती है, तो उसे संबद्ध पक्ष माना जाता है और उनके वोटिंग अधिकारों पर प्रतिबंध लग सकता है।