पब्लिक पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (PPRI) के एक नए अध्ययन ने केरल के गिरते रबर क्षेत्र को बचाने के लिए परित्यक्त बागानों के दोहन और रबर उत्पादक सोसायटियों को पुनर्जीवित करने जैसे कड़े कदम उठाने का सुझाव दिया है।
- रबर उत्पादक सोसायटियों (RPS) का पुनरुद्धार और परित्यक्त बागानों का उपयोग करने की योजना।
- रबर उत्पादन प्रोत्साहन योजना (RPIS) में श्रम को शामिल करने हेतु पुनर्गठन।
- टायर दिग्गजों द्वारा बाजार पर नियंत्रण (Oligopsony) से निपटने की आवश्यकता।
- महिला सशक्तिकरण के लिए रबर-आधारित उद्योगों में विशेष प्रशिक्षण।
केरल के प्राकृतिक रबर क्षेत्र में व्याप्त गहरे संकट को देखते हुए, पब्लिक पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (PPRI) ने राज्य सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है। यह अध्ययन विशेष रूप से कोट्टायम जिले की चिराक्कडवू ग्राम पंचायत पर केंद्रित है, जो रबर उत्पादन के लिए जानी जाती है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि गिरती कीमतों और बाजार की अस्थिरता ने इस क्षेत्र की कमर तोड़ दी है।
बाजार का असंतुलन और 'बायर ओलिगोप्सोनी'
PPRI के निदेशक प्रोफेसर मोहन कुमार के अनुसार, रबर क्षेत्र के संकट का एक प्रमुख कारण 'बायर ओलिगोप्सोनी' (Buyer Oligopsony) है। वर्तमान में, भारत की कुल खपत पर आठ प्रमुख ऑटोमोटिव टायर कंपनियों का 70% से अधिक नियंत्रण है। यह स्थिति छोटे और सीमांत किसानों की सौदेबाजी की शक्ति को लगभग समाप्त कर देती है, जिससे वे बाजार की कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि...
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि केवल सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं है; जब तक मूल्य संवर्धन (Value Addition) और बाजार सुधार नहीं किए जाते, तब तक किसान इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाएंगे। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि रबर उत्पादन प्रोत्साहन योजना (RPIS) को केवल किसानों तक सीमित न रखकर इसमें श्रमिकों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
रबर उत्पादक सोसायटियों का पुनरुद्धार न केवल खेती को बचाएगा, बल्कि किसानों को मूल्य-वर्धित उत्पाद बनाने में भी सक्षम बनाएगा।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि रबर की कीमतों में निरंतर गिरावट के कारण किसान अब अपनी भूमि को रबर के बजाय अनानास या रामबुटान जैसी अन्य फसलों के लिए लीज पर दे रहे हैं। चिराक्कडवू में लाइसेंस प्राप्त रबर डीलरों की संख्या 2020 में 22 से घटकर 2025 तक केवल 5 रह गई है, जो क्षेत्र की गंभीर आर्थिक स्थिति को दर्शाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान संकट
केरल का रबर उद्योग दशकों से राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव और आयात में वृद्धि ने स्थानीय उत्पादकों को हाशिए पर धकेल दिया है। अध्ययन ने विश्व बैंक द्वारा सहायता प्राप्त KERA प्रोजेक्ट के विस्तार की भी मांग की है ताकि यह केवल छह जिलों तक सीमित न रहकर पूरे राज्य के बागानों को कवर कर सके।
Frequently Asked Questions
1. PPRI का अध्ययन किस क्षेत्र पर केंद्रित था?
यह अध्ययन कोट्टायम जिले की चिराक्कडवू ग्राम पंचायत पर केंद्रित था, जो रबर पर अत्यधिक निर्भर है।
2. अध्ययन में क्या मुख्य सुधार सुझाए गए हैं?
मुख्य सुझावों में रबर उत्पादक सोसायटियों को पुनर्जीवित करना, परित्यक्त बागानों का उपयोग करना और RPIS योजना में सुधार करना शामिल है।