एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा का दिवाला मामला पर्सनल गारंटी की जटिलताओं को उजागर करता है। जानिए कैसे एक व्यक्ति बिना पैसा उधार लिए भी हजारों करोड़ का देनदार बन सकता है।

  • सुभाष चंद्रा पर 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से यह राशि उधार नहीं ली थी।
  • पर्सनल गारंटी के तहत, गारंटर मूल कर्जदार के डिफॉल्ट करने पर भुगतान के लिए कानूनी रूप से बाध्य होता है।
  • भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 128 के अनुसार, गारंटर की जिम्मेदारी मूल कर्जदार के समान ही होती है।

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा वर्तमान में एक गंभीर दिवाला मामले के केंद्र में हैं, जिसमें लेनदारों के दावों की राशि 22,006.57 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। हालांकि, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा अनुमोदित पुनर्भुगतान योजना में लेनदारों के लिए केवल 6.25 करोड़ रुपये का प्रावधान है। यह भारी अंतर एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है: जब सुभाष चंद्रा का कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से यह पैसा कभी उधार नहीं लिया, तो उन पर इतना बड़ा दावा कैसे हो सकता है?

इस पूरी कानूनी उलझन का जवाब 'पर्सनल गारंटी' (Personal Guarantee) की अवधारणा में छिपा है। इस मामले में, कर्ज असल में एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कंपनियों द्वारा लिया गया था। सुभाष चंद्रा ने इन ऋणों के लिए व्यक्तिगत गारंटी दी थी। इसका अर्थ यह है कि वह मूल उधारकर्ता (Principal Debtor) नहीं थे, लेकिन उन्होंने ऋणदाताओं को यह आश्वासन दिया था कि यदि कंपनियां भुगतान करने में विफल रहती हैं, तो वह अपनी व्यक्तिगत संपत्ति से इसकी भरपाई करेंगे।

लोन गारंटी क्या होती है?

कानूनी तौर पर, गारंटी एक वादा है जो एक व्यक्ति (गारंटर) किसी ऋणदाता को देता है कि यदि मूल उधारकर्ता डिफॉल्ट करता है, तो वह उस दायित्व को पूरा करेगा। भारत में इसे भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) द्वारा शासित किया जाता है। इसकी धारा 126 तीन पक्षों को परिभाषित करती है: मुख्य देनदार, गारंटर (Surety), और लेनदार (Creditor)।

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि कॉर्पोरेट जगत में प्रमोटरों द्वारा व्यक्तिगत गारंटी देना एक आम लेकिन जोखिम भरा चलन है। बैंक अक्सर कंपनी को एक अलग कानूनी इकाई मानने के बावजूद प्रमोटर से गारंटी मांगते हैं ताकि रिकवरी की संभावना बढ़ सके। यह प्रमोटर की व्यक्तिगत संपत्ति को कंपनी के व्यावसायिक जोखिमों से जोड़ देता है, जिससे व्यापारिक विफलता व्यक्तिगत वित्तीय तबाही में बदल सकती है।

"पर्सनल गारंटी मूल ऋण और गारंटर के बीच एक कानूनी सेतु बनाती है, जो डिफॉल्ट की स्थिति में कॉर्पोरेट पर्दे (Corporate Veil) को हटाकर प्रमोटर को सीधे जवाबदेह बनाती है।"

IBC और व्यक्तिगत गारंटरों की भूमिका

इस मामले में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) की महत्वपूर्ण भूमिका है। IBC की धारा 95 लेनदारों को कॉर्पोरेट ऋण के व्यक्तिगत गारंटरों के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति देती है। यही कारण है कि भले ही कर्ज कंपनियों ने लिया हो, लेकिन कानूनी कार्रवाई सीधे सुभाष चंद्रा के खिलाफ की जा रही है।

विशेषता मूल उधारकर्ता (Principal Debtor) व्यक्तिगत गारंटर (Personal Guarantor)
धन की प्राप्ति ऋण राशि प्राप्त करता है कोई धन प्राप्त नहीं करता
प्राथमिक जिम्मेदारी भुगतान की पहली जिम्मेदारी डिफॉल्ट होने पर जिम्मेदारी
कानूनी दायित्व ऋण समझौते के आधार पर गारंटी अनुबंध और धारा 128 के आधार पर
क्या आप जानते हैं?: भारतीय कानून के तहत, यदि अनुबंध में कुछ अलग न लिखा हो, तो गारंटर की जिम्मेदारी उतनी ही होती है जितनी मूल कर्जदार की, यानी बैंक सीधे गारंटर से पैसे मांग सकता है बिना पहले कंपनी से पूरी वसूली किए।

1. क्या गारंटर केवल तब भुगतान करता है जब कंपनी पूरी तरह दिवालिया हो जाए?
नहीं, ऋणदाता गारंटी का आह्वान (Invoke) कर सकता है और भुगतान की मांग कर सकता है, भले ही कंपनी के खिलाफ अन्य कानूनी उपाय अभी चल रहे हों।

2. क्या पर्सनल गारंटी से व्यक्तिगत संपत्ति जब्त हो सकती है?
हाँ, यदि गारंटर ऋण चुकाने में असमर्थ रहता है, तो अदालत उसकी व्यक्तिगत संपत्तियों की कुर्की और बिक्री का आदेश दे सकती है।