पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की समस्या को हल करने के लिए अब बायोचार (Biochar) और ग्रामीण स्तर पर प्रसंस्करण (Processing) का प्रस्ताव दिया गया है। यह मॉडल न केवल प्रदूषण कम करेगा बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि करेगा।
- पराली अब कचरा नहीं बल्कि एक मूल्यवान संसाधन बन गई है, जिसकी कीमत ₹1.5-2 प्रति किलोग्राम तक है।
- बायोचार तकनीक के जरिए पराली को मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाले कार्बन-समृद्ध पदार्थ में बदला जा सकता है।
- विकेंद्रीकृत 'विलेज चक्की' मॉडल के माध्यम से प्रसंस्करण को खेतों के करीब लाकर परिवहन लागत कम की जा सकती है।
हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ ही दिल्ली और एनसीआर के आसमान में धुंध छा जाती है। इसका मुख्य कारण पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली जलाना है। हालांकि सरकारें उपग्रह चित्रों के माध्यम से निगरानी करती हैं और जुर्माने का डर दिखाती हैं, लेकिन किसानों के लिए आर्थिक समीकरण आज भी चुनौतीपूर्ण हैं। भारी मात्रा में अवशेष, गेहूं की बुवाई के लिए बहुत कम समय और विकल्पों की उच्च लागत उन्हें जलाने पर मजबूर करती है।
लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है। श्वेता सैनी और गोपाल सूद के विश्लेषण के अनुसार, पराली अब केवल कचरा नहीं रही। पावर प्लांट, CBG इकाइयों और पेलेट निर्माताओं की मांग के कारण पंजाब के कुछ हिस्सों में पराली की कीमत ₹1.5 से ₹2 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। अब मुख्य सवाल यह है कि इस मूल्यवर्धन (Value Addition) का लाभ वास्तव में किसान तक कैसे पहुंचे।
बायोचार: मिट्टी के लिए एक वरदान
बायोचार एक कार्बन-समृद्ध सामग्री है जिसे सीमित ऑक्सीजन में बायोमास को गर्म करके बनाया जाता है। लगभग 100 किलोग्राम सूखी पराली से 30 किलोग्राम बायोचार प्राप्त किया जा सकता है। जब इसे मिट्टी में मिलाया जाता है, तो यह जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार करता है, साथ ही कार्बन को सदियों तक मिट्टी में लॉक कर देता है। यह पारंपरिक दहन से अलग है क्योंकि यह कार्बन को वायुमंडल में छोड़ने के बजाय जमीन में सुरक्षित रखता है।
पराली का समाधान केवल इसे खेत से हटाने में नहीं, बल्कि उसके मूल्यवर्धन को खेत के जितना संभव हो सके करीब लाने में है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the current logistics of transporting bulky straw over long distances eat up most of the profit. Currently, the farmer provides the raw material, but the value addition happens in distant factories. If we apply the 'village chakki' (flour mill) logic—where processing happens where the commodity is produced—the economics change drastically. By moving biochar production to the village level via FPOs or SHGs, the cost of transport drops, and the farmer captures a larger share of the profit.
इस मॉडल के तहत, सरकार को हजारों इकाइयां चलाने की आवश्यकता नहीं है। वह केवल मानक, प्रशिक्षण और रियायती वित्त प्रदान कर सकती है। पंचायतें भूमि और समन्वय में मदद कर सकती हैं, जिससे किसान अपनी पराली पास के प्रसंस्करण केंद्र पर ला सकें।
| विशेषता | पारंपरिक दहन (Burning) | बायोचार (Biochar) |
|---|---|---|
| पर्यावरण प्रभाव | वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन | कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) |
| मिट्टी पर प्रभाव | पोषक तत्वों का नुकसान | उर्वरता और जल धारण क्षमता में वृद्धि |
| आर्थिक लाभ | शून्य या नकारात्मक | अतिरिक्त आय का स्रोत |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: बायोचार क्या है और यह पराली जलाने से बेहतर क्यों है?
उत्तर: बायोचार एक कार्बन-समृद्ध पदार्थ है जो बायोमास के नियंत्रित दहन से बनता है। यह वायु प्रदूषण नहीं फैलाता और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारता है।
प्रश्न 2: विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण से किसानों को क्या लाभ होगा?
उत्तर: इससे परिवहन लागत कम होगी और मूल्यवर्धन का लाभ सीधे किसान या स्थानीय सहकारी समितियों को मिलेगा।