Zee TV के संस्थापक सुभाष चंद्रा द्वारा ₹6.5 करोड़ के पुनर्भुगतान प्रस्ताव को NCLT की मंजूरी के बाद, HDFC बैंक अब NCLAT का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है।

  • HDFC बैंक ₹22,006 करोड़ के दावों के बदले ₹6.5 करोड़ के निपटान प्रस्ताव का विरोध कर रहा है।
  • LIC हाउसिंग फाइनेंस (LICHFL) ने स्पष्ट किया है कि मुख्य उधारकर्ताओं की कॉर्पोरेट देनदारियां अभी भी बरकरार हैं।
  • यह मामला Zee TV संस्थापक सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी देनदारियों से जुड़ा है।

एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ में, HDFC बैंक ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में अपील करने की योजना बनाई है। यह कदम नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के उस हालिया आदेश के खिलाफ है, जिसमें Zee TV के संस्थापक सुभाष चंद्रा द्वारा ₹6.5 करोड़ के पुनर्भुगतान प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया था। गौरतलब है कि लेनदारों के कुल दावे ₹22,006 करोड़ के थे।

बैंक, जिसका दावा लगभग ₹705 करोड़ (कुल दावे का 3.2%) है, ने इस समाधान योजना का कड़ा विरोध किया और इसके खिलाफ मतदान किया। हालांकि, लेनदारों के बहुमत ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। HDFC बैंक का तर्क है कि यह राशि अत्यंत अपर्याप्त है। बैंक ने यह भी उल्लेख किया कि उसे यह सुविधा पूर्व HDFC लिमिटेड से विरासत में मिली थी और उधारकर्ता अभी भी ब्याज भुगतान के लिए उत्तरदायी है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के ढांचे के भीतर एक गंभीर तनाव को उजागर करता है: बहुमत आधारित समझौतों और असंतुष्ट वित्तीय लेनदारों की वसूली उम्मीदों के बीच का अंतर। यदि HDFC बैंक NCLAT में सफल होता है, तो यह व्यक्तिगत गारंटी के उच्च-मूल्य वाले मामलों में एक मिसाल कायम कर सकता है, जिससे प्रमोटरों के लिए मामूली भुगतान के जरिए भारी कर्ज से मुक्त होना कठिन हो जाएगा।

₹22,000 करोड़ के दावे और ₹6.5 करोड़ के निपटान के बीच का अंतर व्यक्तिगत दिवालियापन में NCLT की विवेकाधीन शक्तियों के लिए एक अभूतपूर्व परीक्षा है।

HDFC बैंक के विरोध के साथ-साथ, LIC हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (LICHFL), जिसका दावा ₹1,322.39 करोड़ है, ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट की है। LICHFL ने कहा कि NCLT का आदेश केवल व्यक्तिगत गारंटर सुभाष चंद्रा की दिवाला प्रक्रिया से संबंधित है और यह किसी भी तरह से मुख्य उधारकर्ता संस्थाओं की कॉर्पोरेट देनदारियों को कम या समाप्त नहीं करता है। कंपनी ने जोर देकर कहा कि वह गिरवी रखी गई संपत्तियों पर अपना अधिकार बरकरार रखे हुए है और वसूली के लिए सभी कानूनी रास्ते अपनाएगी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह विवाद सुभाष चंद्रा द्वारा स्थापित एस्सेल ग्रुप (Essel Group) के वित्तीय संकट से उपजा है। पिछले कुछ वर्षों में, समूह भारी कर्ज के बोझ तले दबा रहा, जिसके कारण व्यक्तिगत गारंटियों को लागू किया गया। IBC 2016 को ऐसी रिकवरी प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए लाया गया था, लेकिन हाई-प्रोफाइल प्रमोटरों से जुड़े मामलों में अक्सर परिसंपत्तियों के मूल्यांकन और निपटान योजनाओं की निष्पक्षता को लेकर कानूनी पेच फंस जाते हैं।

संस्थादावा राशिसमझौते पर रुख
HDFC बैंक~₹705 करोड़विरोध / NCLAT में अपील
LICHFL₹1,322.39 करोड़मुख्य उधारकर्ताओं से वसूली जारी
कुल दावे₹22,006 करोड़बहुमत द्वारा स्वीकृत (निपटान: ₹6.5 करोड़)
क्या आप जानते हैं?: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) को 2016 में भारत में दिवालियापन समाधान के लिए एक समयबद्ध प्रक्रिया प्रदान करने के लिए पेश किया गया था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: HDFC बैंक NCLT के आदेश की अपील क्यों कर रहा है?
बैंक का मानना है कि ₹22,006 करोड़ के कुल दावों (जिसमें उसका अपना ₹705 करोड़ का दावा शामिल है) के मुकाबले ₹6.5 करोड़ का प्रस्ताव बहुत कम है।

प्रश्न 2: क्या इस समझौते से उधारकर्ताओं का कॉर्पोरेट कर्ज खत्म हो गया है?
नहीं, LICHFL के अनुसार, यह आदेश केवल गारंटर की व्यक्तिगत दिवालियापन प्रक्रिया पर लागू होता है और मुख्य कॉर्पोरेट संस्थाओं की देनदारियों को समाप्त नहीं करता है।