एनसीएलटी (NCLT) की पांच सदस्यीय विशेष बेंच ने एसेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा की पुनर्भुगतान योजना की मंजूरी पर रोक लगा दी है और उन्हें अपनी संपत्ति बेचने से मना किया है।
- एनसीएलटी विशेष बेंच ने 25 अगस्त के उस आदेश पर रोक लगाई जिसमें ₹6.25 करोड़ की योजना को मंजूरी दी गई थी।
- सुभाष चंद्रा को अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेचने से प्रतिबंधित किया गया है।
- मामला ₹22,000 करोड़ के दावों के मुकाबले मात्र ₹6.25 करोड़ के भुगतान प्रस्ताव से जुड़ा है।
- बेंच के सदस्यों के बीच आम सहमति न होने के कारण पांच सदस्यीय विशेष बेंच का गठन किया गया।
एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ में, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की पांच सदस्यीय विशेष बेंच ने मंगलवार को एसेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा द्वारा प्रस्तावित पुनर्भुगतान योजना की मंजूरी पर रोक लगा दी। यह निर्णय तब आया जब ट्रिब्यूनल ने पाया कि इस मामले की सुनवाई करने वाले पिछले सदस्यों के बीच कोई स्पष्ट बहुमत राय नहीं बन पाई थी।
एनसीएलटी अध्यक्ष जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता वाली विशेष बेंच ने उल्लेख किया कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत, जब बेंच के सदस्यों की राय अलग-अलग होती है, तो अतिरिक्त सदस्यों को मामला संदर्भित करना आवश्यक होता है। इसके परिणामस्वरूप, न्यायिक सदस्य श्री नीलेश शर्मा द्वारा 25 अगस्त, 2026 को दिए गए आदेश पर अब रोक लगा दी गई है।
मुख्य विवाद: बाध्यकारी बनाम गैर-बाध्यकारी योजना
एनसीएलटी के भीतर आंतरिक मतभेद इस बात को लेकर है कि क्या स्वीकृत पुनर्भुगतान योजना केवल उन लेनदारों पर बाध्यकारी होनी चाहिए जिन्होंने इसका समर्थन किया, या उन सभी लेनदारों पर भी जिन्होंने इसका विरोध किया। एक सदस्य का मानना था कि असहमत बैंकों को अलग से वसूली की कार्यवाही करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जबकि दूसरे का तर्क था कि स्वीकृत योजना सभी पर लागू होनी चाहिए।
स्वीकृत दावों और प्रस्तावित भुगतान राशि के बीच का भारी अंतर भारतीय वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में व्यक्तिगत गारंटी की पवित्रता को चुनौती देता है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला व्यक्तिगत गारंटरों के संबंध में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के लिए एक लिटमस टेस्ट है। यदि ₹22,000 करोड़ की देनदारी को मात्र ₹6.25 करोड़ में निपटाने की अनुमति दी जाती है, तो यह एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा। यह मामला उस प्रणालीगत संघर्ष को उजागर करता है जिसका सामना ऋणदाता तब करते हैं जब गारंटर की घोषित संपत्ति उसकी देनदारियों की तुलना में नगण्य होती है।
इसके अलावा, लेनदारों का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का हस्तक्षेप स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। अदालत द्वारा श्री चंद्रा को अपनी संपत्तियों को बेचने से रोकने का निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम है ताकि अंतिम निर्णय आने तक संपत्ति के आधार को कम होने से बचाया जा सके।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सुभाष चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही 2024 में इंडियाबुल हाउसिंग फाइनेंस की एक याचिका के बाद शुरू हुई थी। यह कार्यवाही एसेल ग्रुप की कंपनियों की कॉर्पोरेट दिवाला कार्यवाही और ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज से संबंधित नियामक कार्यवाही से अलग है। यह विवाद उन व्यक्तिगत गारंटियों से संबंधित है जो श्री चंद्रा ने समूह से जुड़ी कंपनियों के ऋणों के लिए दी थीं।
| विवरण | विवरण/आंकड़े |
|---|---|
| कुल स्वीकृत दावे | ~₹22,000 करोड़ |
| प्रस्तावित पुनर्भुगतान | ₹6.25 करोड़ |
| समर्थन करने वाले वोट | 80.814% |
| विरोध करने वाले वोट | 19.186% |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. एनसीएलटी ने पिछले आदेश पर रोक क्यों लगाई?
रोक इसलिए लगाई गई क्योंकि बेंच के सदस्यों के बीच इस बात पर सहमति नहीं थी कि पुनर्भुगतान योजना असहमत लेनदारों पर बाध्यकारी होनी चाहिए या नहीं।
2. सुभाष चंद्रा की संपत्तियों की वर्तमान स्थिति क्या है?
विशेष बेंच ने स्पष्ट रूप से श्री चंद्रा को कार्यवाही लंबित रहने तक अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेचने या स्थानांतरित करने से रोक दिया है।