MGNREGA का VB-GRAM G एक्ट में परिवर्तन ग्रामीण भारत के 'काम के अधिकार' को कमजोर कर रहा है। पर्याप्त फंडिंग और न्यूनतम मजदूरी के अभाव में ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट मंडरा रहा है।

  • MGNREGA को हटाकर VB-GRAM G एक्ट लागू करने से ग्रामीण रोजगार में 68% की भारी गिरावट आई है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 'काम के अधिकार' को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के समकक्ष मानने पर विचार किया है।
  • न्यूनतम मजदूरी और बजट की कमी ने ग्रामीण परिवारों की आय को आधा कर दिया है।

भारत के ग्रामीण परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आया है जब केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को विकसित भारत — गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-GRAM G) एक्ट से बदल दिया। 1 जुलाई से लागू हुए इस नए कानून ने उन लाखों परिवारों की उम्मीदों को झटका दिया है जो अपनी आजीविका के लिए इस गारंटीकृत रोजगार पर निर्भर थे। आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों के औसत की तुलना में इस साल जुलाई और अगस्त में रोजगार में 68% की चौंकाने वाली कमी देखी गई है।

इस मुद्दे ने तब और तूल पकड़ा जब भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों में न्यूनतम मजदूरी के मामले में सुनवाई की। अदालत ने इस बात की जांच की कि क्या 'काम के अधिकार' को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना जाना चाहिए। यह बहस केवल कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक है, क्योंकि यह सीधे तौर पर नागरिक के जीवन के अधिकार से जुड़ी है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक बहस

संविधान सभा की बहसों के दौरान, प्रोफेसर के.टी. शाह जैसे सदस्यों ने काम के अधिकार को एक मौलिक अधिकार बनाने की पुरजोर वकालत की थी। हालांकि, डॉ. बी.आर. अंबेडकर का मानना था कि तत्कालीन आर्थिक परिस्थितियों में इसे तत्काल सार्वभौमिक रूप से लागू करना संभव नहीं था। इसी कारण इसे राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) के अनुच्छेद 41 में रखा गया, जो सरकार को अपनी आर्थिक क्षमता के भीतर काम का अधिकार सुरक्षित करने का निर्देश देता है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि जब सरकार MGNREGA जैसे मांग-आधारित ढांचे को हटाकर एक बजट-सीमित (capped) मॉडल अपनाती है, तो वह वास्तव में 'गारंटी' शब्द का अर्थ बदल देती है। VB-GRAM G एक्ट के तहत फंड की मनमानी सीमा तय करना और इसे न्यूनतम मजदूरी से न जोड़ना, रोजगार की गारंटी को केवल एक कागजी वादा बना देता है। इससे न केवल ग्रामीण मांग घटती है, बल्कि समग्र आर्थिक विकास की गति भी धीमी होती है।

"काम का अधिकार केवल एक नीति नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और संवैधानिक वादे की पूर्ति है, जिसे बजटीय बाधाओं की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।"

2005 में MGNREGA का पारित होना एक ऐतिहासिक मोड़ था जिसने पहली बार भारत में काम के अधिकार को वैधानिक वास्तविकता बनाया। लेकिन 2009 के बाद से, मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 से अलग कर दिया गया, जिससे मजदूरी मुद्रास्फीति के मुकाबले बहुत कम रह गई। वर्तमान में, ग्रामीण परिवारों की कुल आय पिछले वर्ष की तुलना में लगभग आधी हो गई है।

विशेषता MGNREGA (पुराना) VB-GRAM G (नया)
दृष्टिकोण मांग-आधारित अधिकार बजट-सीमित मिशन
रोजगार स्तर उच्च (स्थिर औसत) 68% की गिरावट (प्रारंभिक डेटा)
वित्तीय बोझ केंद्र द्वारा मुख्य वित्तपोषण राज्यों पर अधिक वित्तीय भार
क्या आप जानते हैं?: सुप्रीम कोर्ट ने 'ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन' (1985) मामले में फैसला सुनाया था कि आजीविका का अधिकार, जीवन के मौलिक अधिकार का एक अनिवार्य हिस्सा है।

Frequently Asked Questions

1. VB-GRAM G एक्ट और MGNREGA में मुख्य अंतर क्या है?
MGNREGA एक कानूनी गारंटी थी जहाँ मांग पर काम मिलना था, जबकि VB-GRAM G एक मिशन-आधारित दृष्टिकोण है जिसमें फंड की सीमाएं तय हैं और राज्यों पर वित्तीय बोझ अधिक है।

2. क्या काम का अधिकार एक मौलिक अधिकार है?
वर्तमान में यह राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 41) के तहत है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट अब इस पर विचार कर रहा है कि इसे अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना जाए या नहीं।