जनपहैल के एक नए सर्वेक्षण ने खुलासा किया है कि भारत में गिग वर्कर्स अब अल्पकालिक काम नहीं बल्कि लंबे समय तक चलने वाला पूर्णकालिक रोजगार कर रहे हैं, जो असुरक्षित परिस्थितियों और अत्यधिक काम के बोझ से जूझ रहे हैं।
- 57% गिग वर्कर्स प्रति सप्ताह 49 घंटे से अधिक काम करते हैं।
- 72.3% कर्मचारी एक वर्ष से अधिक समय से इन प्लेटफार्मों से जुड़े हैं।
- अधिकांश श्रमिकों के पास बुनियादी सुविधाओं जैसे विश्राम क्षेत्र और पीने के पानी का अभाव है।
भारत की तेजी से बढ़ती प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था के पीछे छिपे कड़वे सच को उजागर करते हुए, गैर-सरकारी संगठन जनपहैल (Janpahal) द्वारा किए गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिसे पहले केवल 'अतिरिक्त आय' का जरिया माना जाता था, वह अब भारत में लाखों लोगों के लिए एक दीर्घकालिक और पूर्णकालिक रोजगार का रूप ले चुका है।
सर्वेक्षण में शामिल 1,000 श्रमिकों के डेटा से पता चलता है कि गिग वर्क अब अस्थाई नहीं रह गया है। लगभग 72.3% श्रमिक एक साल से अधिक समय से इन प्लेटफार्मों पर काम कर रहे हैं, जिसमें 18.4% तो पांच साल से अधिक समय से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। यह दर्शाता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था पर निर्भरता अब एक स्थायी जीवनशैली बन गई है।
काम के घंटे और अत्यधिक थकान
रिपोर्ट के अनुसार, काम का बोझ अत्यधिक है। लगभग 57% श्रमिकों ने बताया कि वे सप्ताह में 49 घंटे से अधिक काम करते हैं, जबकि 23% श्रमिक प्रति सप्ताह 70 घंटे से अधिक की कठिन शिफ्ट पूरी कर रहे हैं। अत्यधिक काम के कारण 64.5% श्रमिकों ने थकान और नींद की समस्या की शिकायत की है।
गिग अर्थव्यवस्था का विस्तार श्रमिकों के शोषण की कीमत पर हो रहा है, जहाँ काम के घंटे तो बढ़ रहे हैं लेकिन सुरक्षा और अधिकार शून्य हैं।
बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव
सर्वेक्षण में कार्यस्थल पर बुनियादी मानवीय गरिमा की कमी भी सामने आई है। 74.6% श्रमिकों के पास विश्राम करने के लिए कोई जगह नहीं है, और 53.8% को पीने के पानी के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 66.2% कर्मचारी काम के दौरान कभी ब्रेक नहीं ले पाते हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में गिग वर्कर्स का बढ़ता आधार सरकार और नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। जब तक इन श्रमिकों को कानूनी मान्यता और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक यह 'डिजिटल क्रांति' केवल एक अनियंत्रित श्रम बाजार बनकर रह जाएगी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में गिग इकोनॉमी पिछले एक दशक में तेजी से उभरी है। उबर, जोमैटो और स्विगी जैसे प्लेटफार्मों के उदय ने रोजगार के नए अवसर तो पैदा किए, लेकिन साथ ही 'श्रमिक' की पारंपरिक परिभाषा को भी चुनौती दी है, जिससे वे सामाजिक सुरक्षा लाभों से वंचित रह गए हैं।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: गिग वर्कर्स को किन मुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर: उन्हें असुरक्षित कार्य परिस्थितियां, अत्यधिक काम के घंटे, सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम और बुनियादी सुविधाओं जैसे शौचालय और पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।
प्रश्न 2: जनपहैल की रिपोर्ट क्या सिफारिश करती है?
उत्तर: रिपोर्ट में गिग वर्कर्स को कानूनी मान्यता देने, सुरक्षा मानक लागू करने और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है।