चिट्टूर जिले में मार्च से चल रहे सूखे ने खारिफ फसलों पर 64.5% वर्षा घाटा पैदा किया है। पश्चिमी मंडलों में 78% से अधिक की कमी ने भूजल, पीने का पानी और चारा स्रोतों पर दबाव डाला है। किसानों के लिए भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है।
- कुल 64.5% वर्षा घाटा, खारिफ फसल पर गहरा असर
- पश्चिमी मंडलों में 78% से अधिक सूखे की दर
- भूजल और चारा स्रोतों पर गंभीर दबाव
पृष्ठभूमि
चिट्टूर, एंटहर प्रांत का एक कृषि प्रधान जिला, 2026 की पहली तिमाही से लगातार सूखे के शिकार रहा है। जून-अगस्त के दौरान सामान्य 8,543.1 मिमी की तुलना में केवल 3,033.4 मिमी वर्षा हुई, जिससे 64.5% की गंभीर कमी हुई।
सूखे की गतिशीलता
जून में 1,476.4 मिमी वर्षा के बावजूद, जुलाई में केवल 414.8 मिमी और अगस्त में 1,073.2 मिमी प्राप्त हुए, जिससे क्रमशः 85.5% और 66.9% की कमी हुई। विशेषकर गुडुपाले (90.9%) और इराला (87.4%) में सूखे की तीव्रता अधिक रही।
किसानों पर प्रभाव
बढ़ती लागत और भूजल स्तर में गिरावट ने किसानों को नयी बोरवेल खोदने से रोक दिया। फसलें नमी के अभाव में जड़ जमाने में असफल रही, जिससे पौधे सूखने लगे। एक खेत अधिकारी ने बताया कि “एल निनो के प्रभाव से जल स्रोतों पर दबाव बढ़ गया है।”
पानी स्रोतों पर दबाव
टैंक्स, तालाब और नदियों में पानी का प्रवाह घटने से ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की कमी गहरी हो गई। कप्पम और पालामानेर जैसे डेयरी केन्द्रों में चारा की कमी ने पशुपालन पर भी असर डाला।
क्यों यह महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यदि इस सूखे को समय पर नियंत्रित नहीं किया गया तो एंटहर प्रांत की कृषि अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा। यह न केवल किसानों की आजीविका बल्कि राज्य की खाद्य सुरक्षा को भी खतरे में डालता है।
“कृषि में जल प्रबंधन को प्राथमिकता देना अनिवार्य है, अन्यथा भविष्य में ऐसे सूखे से बड़े पैमाने पर फसल नुकसान हो सकता है।” – डॉ. राजेश कुमार, जल विज्ञान विशेषज्ञ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या सरकार ने सूखे से जूझ रहे किसानों को सहायता योजनाएँ घोषित की हैं?
उत्तर: हाँ, राज्य सरकार ने जल संरक्षण और सूखा राहत के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें बोरवेल सब्सिडी और सिंचाई अनुदान शामिल हैं।
प्रश्न 2: क्या चिट्टूर के किसानों के पास वैकल्पिक फसल विकल्प हैं?
उत्तर: कुछ किसान सूखे‑प्रतिरोधी फसलों जैसे ज्वार, बाजरा और दलहन पर स्विच कर रहे हैं, लेकिन इसके लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता की आवश्यकता है।