दक्षिण कोरिया ने स्वीकार किया है कि उसका सरकारी नेतृत्व वाला ऑफशोर विंड मॉडल प्रभावी नहीं रहा। यह खबर भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक हो सकती है जो वर्तमान में इसी तरह की नीतियों का पालन कर रहा है।
- दक्षिण कोरिया ने अपने वर्तमान ऑफशोर विंड विकास मॉडल की विफलता को स्वीकार किया है।
- सरकार ने अब साइट नियोजन (site planning) के लिए नई रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया है।
- भारत वर्तमान में दक्षिण कोरिया के इसी पुराने मॉडल का अनुसरण कर रहा है, जो जोखिम भरा हो सकता है।
हाल ही में, दक्षिण कोरिया ने एक महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति की है कि उसका अब तक का ऑफशोर विंड (अपतटीय पवन ऊर्जा) विकास मॉडल अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहा है। दक्षिण कोरिया, जो नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था, अब अपने सरकारी नेतृत्व वाले साइट नियोजन मॉडल की कमियों को पहचान रहा है। यह विकास उस समय हो रहा है जब देश ने 2031 तक 25 गीगावाट (GW) के प्रारंभिक ऑफशोर विंड क्षेत्रों को नामित करने का लक्ष्य रखा है।
दक्षिण कोरिया की यह विफलता मुख्य रूप से अत्यधिक केंद्रीकृत और सरकारी नियंत्रण वाली साइट योजना के कारण हुई है, जिसने निजी निवेश और तकनीकी नवाचार को बाधित किया। विशेषज्ञों का मानना है कि जब सरकार ही सब कुछ तय करती है, तो बाजार की गतिशीलता और वास्तविक साइट की जटिलताओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि भारत के लिए यह एक 'वेक-अप कॉल' है। भारत वर्तमान में अपनी विशाल तटरेखा का लाभ उठाने के लिए इसी तरह के सरकारी-केंद्रित मॉडल पर काम कर रहा है। यदि भारत भी साइट चयन और अनुमति प्रक्रियाओं में अत्यधिक नौकरशाही और केंद्रीकरण का उपयोग करता है, तो वह भी दक्षिण कोरिया जैसी ही धीमी प्रगति और उच्च लागत का सामना कर सकता है।
ऊर्जा संक्रमण की सफलता केवल लक्ष्यों पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि बाजार को कितनी स्वतंत्रता दी जाती है।
भारत में, ऑफशोर विंड परियोजनाओं को लेकर अभी भी स्पष्टता का अभाव है। जहाँ दक्षिण कोरिया अब अपनी रणनीति बदल रहा है, वहीं भारत अभी भी नियामक अनिश्चितता और जटिल भूमि/समुद्री आवंटन प्रक्रियाओं से जूझ रहा है। Enerdata और अन्य वैश्विक संस्थाओं के अनुसार, एक सफल मॉडल के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी और बाजार-संचालित साइट विकास अनिवार्य है।
Historical Background
ऐतिहासिक रूप से, कई एशियाई देश ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 'टॉप-डाउन' दृष्टिकोण अपनाते रहे हैं। हालांकि, यूरोपीय देशों (जैसे डेनमार्क और यूके) ने दिखाया है कि एक हाइब्रिड मॉडल, जहाँ सरकार केवल बुनियादी ढांचा और नीति प्रदान करती है और निजी क्षेत्र विकास का नेतृत्व करता है, कहीं अधिक सफल होता है।
Frequently Asked Questions
1. दक्षिण कोरिया का मॉडल क्यों विफल हुआ?
मुख्य कारण अत्यधिक सरकारी नियंत्रण और साइट नियोजन में बाजार की वास्तविकताओं की अनदेखी थी।
2. भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?
भारत को अपनी नीतियों में लचीलापन लाना होगा ताकि निजी निवेशक और तकनीक अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकें।