नारियल के छिलकों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि और चीनी कंपनियों की कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण भारतीय एक्टिवेटेड कार्बन निर्माता संकट में हैं और केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
- नारियल के छिलकों की बढ़ती कीमतों ने वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों को महंगा बना दिया है।
- चीनी कंपनियां इंडोनेशिया और फिलीपींस से कच्चा माल लेकर अफ्रीका और यूरोप में कब्जा जमा रही हैं।
- कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नारियल के छिलकों को GST के दायरे में लाने का प्रस्ताव।
एक्टिवेटेड कार्बन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने भारत में इस उद्योग की स्थिरता को लेकर गंभीर चिंता जताई है। लगभग ₹4,700 करोड़ के कार्बन-आधारित निर्यात बाजार के सामने वर्तमान में दोहरी चुनौती है: घरेलू कच्चे माल की महंगाई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी कंपनियों की आक्रामक नीतियां।
एसोसिएशन के अनुसार, दक्षिण भारतीय राज्यों में नारियल के छिलकों की कीमतें अनियंत्रित रूप से बढ़ गई हैं। इससे एक्टिवेटेड कार्बन बनाने की लागत में भारी वृद्धि हुई है, जो जल शोधन और वायु निस्पंदन जैसे महत्वपूर्ण उद्योगों में उपयोग किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय निर्यातकों के लिए वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो गया है।
चीन की चुनौती
स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब हम चीनी निर्माताओं की रणनीति को देखते हैं। ये कंपनियां इंडोनेशिया और फिलीपींस से पूरे नारियल खरीद रही हैं, उनके छिलकों से एक्टिवेटेड कार्बन तैयार कर रही हैं और उन्हें अफ्रीका तथा यूरोपीय देशों में बहुत कम कीमतों पर निर्यात कर रही हैं। यह रणनीति भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल कीमतों का मुद्दा नहीं है, बल्कि सप्लाई चेन की विफलता है। यदि भारत कच्चे माल की लागत को स्थिर करने में विफल रहता है, तो वह उच्च-मूल्य वाले कार्बन बाजार में अपनी पकड़ खो सकता है। इससे कृषि प्रसंस्करण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार का नुकसान हो सकता है।
नारियल के छिलकों के लिए एक विनियमित मूल्य तंत्र की कमी उद्योग को स्थानीय अस्थिरता और वैश्विक शिकारी मूल्य निर्धारण के प्रति संवेदनशील बनाती है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, एसोसिएशन सरकारी अधिकारियों से संपर्क करने की योजना बना रहा है ताकि नारियल के छिलकों और कोयले को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाया जा सके। उनका तर्क है कि GST लागू होने से कीमतों का नियमन होगा और असंगठित बाजार में होने वाली मनमानी बढ़ोतरी पर लगाम लगेगी।
कच्चे माल के अलावा, निर्यातक भू-राजनीतिक और लॉजिस्टिक समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। पश्चिम एशिया में तनाव और संयुक्त राज्य अमेरिका में कर विवादों ने व्यापार को बाधित किया है। इसके अलावा, शिपिंग कंटेनरों और जहाजों की कमी ने माल ढुलाई की लागत बढ़ा दी है, जिससे मुनाफा और कम हो गया है।
| महीना | अनुमानित मूल्य (प्रति किलो) |
|---|---|
| सितंबर | ₹105 - ₹107 |
| अक्टूबर | ₹98 - ₹100 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सरकार से नारियल के छिलकों पर GST लगाने की मांग क्यों की जा रही है?
निर्यातकों का मानना है कि GST से यह व्यापार औपचारिक होगा और एक मूल्य नियमन प्रणाली बनेगी, जिससे स्थानीय बाजार में कीमतों की अनियंत्रित वृद्धि रुकेगी।
प्रश्न 2: चीनी कंपनियां भारतीय फर्मों को कैसे पछाड़ रही हैं?
चीनी कंपनियां दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे इंडोनेशिया और फिलीपींस से सस्ता कच्चा माल लेती हैं, जिससे वे यूरोप और अफ्रीका में बहुत कम कीमत पर उत्पाद बेच पाती हैं।