ब्रिक्स देशों के बीच 'जयपुर सहमति' के माध्यम से महिला उद्यमियों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की तैयारी है। लेख विश्लेषण करता है कि कैसे भारत अपनी 'लखपति दीदी' योजना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जा सकता है।

  • महिला उद्यमियों के लिए क्रेडिट, खरीदार और बाजार तक पहुंच तीन मुख्य बाधाएं हैं।
  • भारत में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं, जो वार्षिक 1 लाख रुपये से अधिक कमाती हैं।
  • PLFS 2025 के अनुसार महिला श्रम बल भागीदारी बढ़कर 40% हो गई है।

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स महिला-नेतृत्व विकास सम्मेलन में वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल ने महिला उद्यमियों के सामने आने वाली तीन बुनियादी चुनौतियों—ऋण (Credit), खरीदारों की उपलब्धता और पूर्वानुमेय नियमों—की पहचान की। यह संबोधन केवल एक प्रोत्साहन नहीं, बल्कि एक स्पष्ट निदान था कि यदि महिलाओं को वास्तव में वैश्विक व्यापार का हिस्सा बनाना है, तो ठोस आंकड़ों और समय सीमा की आवश्यकता है।

भारत के घरेलू आंकड़े इस दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं। लगभग 30 करोड़ महिलाओं के बैंक खाते खोले गए हैं और 10 करोड़ ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का हिस्सा हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 3 करोड़ से अधिक महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। हालांकि, आंकड़ों के विश्लेषण में एक विसंगति दिखाई देती है। मंत्री गोयल ने महिला कार्यबल भागीदारी को 19% बताया, जबकि PLFS (Periodic Labour Force Survey) की 2025 की रिपोर्ट इसे 40% बताती है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि आंकड़ों का यह अंतर केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि रणनीतिक है। यदि भारत विश्व बैंक के 19% के आंकड़े को बेंचमार्क मानता है, तो 50% का लक्ष्य एक असंभव छलांग जैसा लगेगा। लेकिन यदि PLFS के 40% को आधार बनाया जाए, तो यह लक्ष्य पूरी तरह से प्राप्त करने योग्य और विश्वसनीय हो जाता है। यह दर्शाता है कि विकास की कहानी सुनाने के लिए सही डेटा का चुनाव कितना महत्वपूर्ण है।

"जयपुर सहमति को अब केवल चर्चाओं से निकलकर एक निश्चित तिथि और पूंजीगत लक्ष्य के साथ क्रियान्वित करने की आवश्यकता है।"

बाजार पहुंच के संदर्भ में, 'जयपुर सहमति' के तहत ब्रिक्स देशों ने एक साझा व्यापार मंच और महिला उन्नति कोष बनाने पर चर्चा की है। लेकिन समस्या 'स्केल' (पैमाने) की है। वैश्विक सेवा व्यापार लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर का है, जबकि सरकारी स्तर पर छोटे consignments की सफलताएं बहुत सीमित हैं। जब तक इस कोष का पूंजीकरण नहीं होता, यह केवल एक कागजी दस्तावेज बना रहेगा।

भारत के पास इस विमर्श का नेतृत्व करने की पूरी क्षमता है। अप्रैल से अगस्त के बीच व्यापार निर्यात में 15% से अधिक की वृद्धि हुई है और जीडीपी में 7.8% की बढ़त देखी गई है। 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी को गणितीय रूप से बढ़ाया जाएगा।

संस्था/स्रोतमहिला कार्यबल भागीदारी (%)प्रभाव
विश्व बैंक (World Bank)~19%लक्ष्य कठिन और केवल बयानबाजी लगता है
PLFS (भारत सरकार)40.0%लक्ष्य विश्वसनीय और प्राप्त करने योग्य है

इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए तीन कदम अनिवार्य हैं: पहला, फंड के लिए एक निश्चित पूंजी लक्ष्य और वितरण तिथि तय हो। दूसरा, व्यापार मंच पर मानकों की आपसी मान्यता (Mutual Recognition) हो ताकि कागजी कार्रवाई छोटी निर्यातकों को न रोके। तीसरा, भारत के SHG मॉडल को NDB (New Development Bank) के माध्यम से अन्य ब्रिक्स देशों में लागू किया जाए।

क्या आप जानते हैं?: भारत में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से ऋण वितरण में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 68% है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: 'लखपति दीदी' योजना क्या है?
उत्तर: यह एक पहल है जिसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान कर उनकी वार्षिक आय 1 लाख रुपये से अधिक करना है।

प्रश्न 2: जयपुर सहमति (Jaipur Consensus) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका उद्देश्य ब्रिक्स देशों के बीच महिला-नेतृत्व वाले विकास को बढ़ावा देना और उनके लिए एक साझा व्यापार मंच और फंड बनाना है।