नई दिल्ली में आयोजित BRICS बिजनेस फोरम में सदस्य देशों ने डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा की, हालांकि आधिकारिक तौर पर साझा मुद्रा के बजाय स्थानीय मुद्राओं और डिजिटल भुगतान प्रणालियों को प्राथमिकता दी गई है।

  • BRICS देशों ने साझा मुद्रा के बजाय स्थानीय मुद्रा निपटान (Local Currency Settlement) पर सहमति जताई है।
  • रूस और ईरान ने वैश्विक वित्तीय प्रणाली में डॉलर के प्रभुत्व को राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बताया।
  • BRICS पेमेंट टास्क फोर्स (BPTF) क्रॉस-बॉर्डर भुगतान के लिए सुरक्षित और सस्ते तंत्र विकसित कर रहा है।

नई दिल्ली में आयोजित BRICS बिजनेस फोरम 2026 के दौरान दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास देखने को मिला। एक ओर जहां सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों के संयुक्त बयान में अत्यधिक सावधानी बरती गई, वहीं दूसरी ओर रूस और ईरान जैसे देशों के नेताओं ने डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने की पुरजोर वकालत की।

आधिकारिक दस्तावेज़ों में किसी 'साझा BRICS मुद्रा' का कोई उल्लेख नहीं है। इसके बजाय, समूह ने इंटरऑपरेबल भुगतान प्रणालियों और स्वैच्छिक सहयोग जैसे तकनीकी समाधानों पर ध्यान केंद्रित किया है। पीयूष गोयल ने भी इस बात पर जोर दिया कि BRICS राष्ट्रों को अपनी भुगतान प्रणालियों को जोड़ना चाहिए और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना चाहिए ताकि वैश्विक व्यापार अधिक लचीला बन सके।

क्यों यह मायने रखता है (BozokMedia विश्लेषण)

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि BRICS के भीतर 'डी-डलराइजेशन' को लेकर दो अलग-अलग विचारधाराएं काम कर रही हैं। रूस और ईरान जैसे देश, जो अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं, इसे एक अस्तित्वगत आवश्यकता के रूप में देखते हैं। इसके विपरीत, भारत और ब्राजील जैसे देश अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपना रहे हैं, जो डॉलर को पूरी तरह हटाने के बजाय वित्तीय विकल्पों के विविधीकरण (Diversification) में विश्वास रखते हैं।

"वित्तीय प्रणालियों का एक ही मुद्रा पर केंद्रित होना वैश्विक अर्थव्यवस्था को राजनीतिक अस्थिरता के प्रति असुरक्षित बनाता है।" - राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन।

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने तर्क दिया कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली का सीमित मुद्राओं के इर्द-गिर्द केंद्रित होना अर्थव्यवस्थाओं को राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बनाता है। उन्होंने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की क्षमता बढ़ाने का सुझाव दिया ताकि सदस्य देश अमेरिकी मुद्रा पर निर्भर रहे बिना आर्थिक लेनदेन कर सकें।

वहीं, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रतिबंधों और माध्यमिक प्रतिबंधों (Secondary Sanctions) के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रतिबंधित करने के प्रयासों की आलोचना की। उन्होंने एक 'नए और टिकाऊ वैश्विक विकास मंच' के निर्माण का आह्वान किया, जो पश्चिमी वित्तीय ढांचे से स्वतंत्र हो।

डी-डलराइजेशन की राह इतनी आसान नहीं है। इसके लिए न केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, बल्कि द्विपक्षीय व्यापार निपटान में वृद्धि, बिचौलियों की संख्या में कमी और New Development Bank द्वारा स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण के विस्तार जैसी जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं की आवश्यकता है।

दृष्टिकोण तकनीकी/आधिकारिक रुख राजनीतिक/रणनीतिक रुख (रूस/ईरान)
मुद्रा स्थानीय मुद्रा निपटान डॉलर का विकल्प/साझा तंत्र
भुगतान इंटरऑपरेबल सिस्टम पश्चिमी प्रणालियों से पूर्ण अलगाव
लक्ष्य दक्षता और पारदर्शिता प्रतिबंधों से मुक्ति और संप्रभुता
क्या आप जानते हैं?: न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को अक्सर 'BRICS बैंक' कहा जाता है, और इसका मुख्यालय शंघाई, चीन में है, जो इसे IMF और वर्ल्ड बैंक का एक विकल्प बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या BRICS अपनी खुद की एक नई मुद्रा लॉन्च कर रहा है?
फिलहाल, आधिकारिक तौर पर किसी साझा मुद्रा की योजना नहीं है; ध्यान केवल स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ाने पर है।

2. डी-डलराइजेशन से भारत को क्या लाभ होगा?
इससे विदेशी मुद्रा भंडार का दबाव कम होगा और व्यापारिक लेनदेन की लागत में कमी आएगी।