कर्नाटक फिल्म चेम्बर ऑफ कॉमर्स की अध्यक्ष जैमला ने एस. जानकी की संगीत विरासत को संरक्षित करने के लिए मैसूर विश्वविद्यालय में एक संगीत अध्ययन कुर्सी की मांग की। यह प्रस्ताव भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- जमैला ने एस. जानकी संगीत अध्ययन कुर्सी की स्थापना की मांग की
- कर्नाटक सरकार को इस पहल को मंजूरी देने का आह्वान किया
- कुर्सी भविष्य की पीढ़ियों के लिए संगीत शिक्षा को सुदृढ़ करेगी
कर्नाटक फिल्म चेम्बर ऑफ कॉमर्स (KFCC) की वरिष्ठ अभिनेत्री और अध्यक्ष जैमला ने 12 जुलाई, 2026 को मैसूर विश्वविद्यालय के महाराजा कॉलेज मैदान में आयोजित अंतिम संस्कार समारोह में एक भावनात्मक अपील की। उन्होंने राज्य सरकार से अनुरोध किया कि वह एस. जानकी संगीत अध्ययन कुर्सी स्थापित करे, जिससे इस आइकॉनिक गायिका की अनमोल धरोहर को भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाया जा सके।
पृष्ठभूमि और इतिहास
एस. जानकी (1938‑2026) ने भारतीय फिल्म उद्योग में लगभग 48,000 गाने गाए, 20 से अधिक भाषाओं में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते हुए। उनका करियर 1950 के दशक से लेकर 2020 तक फैला, जिसमें उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते। उनकी अनूठी आवाज़ ने कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और अन्य दक्षिणी भारतीय भाषाओं के सिनेमा को नई दिशा दी। जैमला ने बताया कि जानकी ने उनका पहला गीत फिल्म प्रेमदा कणिके (1975) में गाया था, जहाँ उन्होंने डॉक्टर राजकुमार के साथ अभिनय किया था।
जैमला का प्रस्ताव और उसका महत्व
जैमला ने कहा, “एस. जानकी का संगीत हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेगा, लेकिन उसकी रचनाओं को संरक्षित करने के लिए संस्थागत समर्थन आवश्यक है। एक समर्पित अध्ययन कुर्सी न केवल उनके कार्यों को दस्तावेज़ीकरण करेगी, बल्कि शोधकर्ताओं, संगीतकारों और छात्रों को उनके संगीत के गहन विश्लेषण का अवसर भी देगी।” यह पहल न केवल कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत को सुदृढ़ करेगी, बल्कि भारतीय संगीत शिक्षा में एक नया मानक स्थापित करेगी।
उद्योग की प्रतिक्रिया
संगीतकार विजय प्रकाश और राजेश कृष्णन सहित कई कलाकारों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। विजय प्रकाश ने कहा, “जानकी की आवाज़ ने हमें संगीत सीखने का सही मार्ग दिखाया। उनका मार्गदर्शन और प्रोत्साहन हम सभी के लिए अमूल्य रहा।” अन्य कलाकारों ने भी कहा कि जानकी ने सिखाने, मार्गदर्शन करने और युवा कलाकारों को प्रेरित करने में कभी झिझक नहीं दिखाई।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि राज्य सरकार इस कुर्सी को स्थापित करती है, तो यह सत्रवार व्याख्यान, कार्यशालाओं, रिकॉर्डिंग अभिलेखों की डिजिटल संग्रहण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी प्रेरित कर सकती है। यह पहल कर्नाटक के संगीत शिक्षण संस्थानों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिला सकती है, जिससे भारतीय शास्त्रीय और फिल्म संगीत का वैश्विक स्तर पर प्रसार संभव हो सकेगा।