उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक शातिर हनीट्रैप गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है, जो पुलिस अधिकारियों और पत्रकारों का रूप धरकर लोगों को ब्लैकमेल कर रहा था। पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और अन्य की तलाश जारी है।
मुख्य बातें
- मेरट में पुलिस और पत्रकारों के रूप में काम करने वाले हनीट्रैप गिरोह का पर्दाफाश।
- दो आरोपी गिरफ्तार, दो अन्य की तलाश जारी।
- फेक महिला प्रोफाइल और डीपफेक वीडियो का उपयोग कर ब्लैकमेलिंग की जाती थी।
- पुलिस की फर्जी वेशभूषा, वॉकी-टॉकी और फर्जी दस्तावेज बरामद।
उत्तर प्रदेश के मेरट में पुलिस ने एक ऐसे शातिर गिरोह का भंडाफोड़ किया है जो खुद को पुलिस अधिकारी, वरिष्ठ पुलिसकर्मी और पत्रकार बताकर लोगों को हनीट्रैप के जाल में फंसाता था। पुलिस ने इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि गिरोह के अन्य दो सदस्यों की तलाश के लिए छापेमारी की जा रही है।
कैसे बुना गया ठगी का जाल?
यह मामला तब सामने आया जब नीरज पाल नामक एक निवासी ने शिकायत दर्ज कराई। नीरज को एक फर्जी महिला प्रोफाइल के माध्यम से सोशल मीडिया पर संपर्क किया गया। आरोपियों ने बातचीत के दौरान एक अंतरंग रिश्ता बनाया और विश्वास जीतने के बाद उसे मिलने के लिए बुलाया। जब नीरज निर्धारित स्थान पर पहुँचा, तो वहां महिला के बजाय दो पुरुष मिले, जिन्होंने खुद को पुलिसकर्मी और पत्रकार बताते हुए उसे झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी और 2 लाख रुपये की मांग की।
BozokMedia विश्लेषण: तकनीक का दुरुपयोग
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह गिरोह केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि डिजिटल रूप से भी अत्यंत खतरनाक था। आरोपी पीड़ित के वीडियो रिकॉर्ड करते थे और फिर डीपफेक (Deepfake) तकनीक का उपयोग करके उन्हें और अधिक ब्लैकमेल करने के लिए इस्तेमाल करते थे। वे इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्मों का उपयोग करके नए शिकार चुनते थे।
डिजिटल युग में हनीट्रैप अब केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से नियोजित अपराध बन गए हैं।
बरामद किए गए सामान की सूची
पुलिस ने आरोपियों के पास से भारी मात्रा में ऐसा सामान बरामद किया है जिससे वे खुद को असली अधिकारी दिखा सकें:
| वस्तु का प्रकार | विवरण |
|---|---|
| वाहन | बिना नंबर प्लेट की मारुति ऑल्टो |
| संचार उपकरण | वॉकी-टॉकी, मोबाइल फोन, टेलीफोन सेट |
| दस्तावेज | फर्जी सील, नेमप्लेट, बीट बुक, आधिकारिक दिखने वाली फाइलें |
| अन्य | लैपटॉप, टैबलेट, कैलकुलेटर, फोनपे रिसीवर बॉक्स |
पुलिस अधिकारी विनय गोपाल भोंसले ने स्पष्ट किया कि आरोपियों ने कोई फर्जी पुलिस चौकी नहीं चलाई थी, बल्कि एक किराए के कार्यालय का उपयोग किया था जिसके बाहर 'कार्यालय' लिखा था। पुलिस अब इस गिरोह के अन्य संभावित पीड़ितों की पहचान करने में जुटी है।
Frequently Asked Questions
1. यह गिरोह शिकार कैसे चुनता था?
यह गिरोह इंस्टाग्राम पर फर्जी महिला प्रोफाइल बनाकर लोगों से संपर्क करता था और फिर उन्हें जाल में फंसाता था।
2. क्या आरोपियों ने वास्तव में पुलिस चौकी बनाई थी?
नहीं, पुलिस के अनुसार यह एक किराए का कार्यालय था, कोई आधिकारिक या फर्जी पुलिस चौकी नहीं थी।