एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार किया गया नया रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को लैंगिक हिंसा के मामलों में संवेदनशील भाषा और ट्रॉमा‑इनफ़ॉर्म्ड प्रक्रियाओं को अपनाने की सलाह देता है। यह 2023 के हैंडबुक को प्रतिस्थापित कर अधिक व्यावहारिक सुधारों की रूपरेखा पेश करता है।

मुख्य बिंदु

  • न्यायालयीन भाषा में सर्वाइवर‑सेंट्रिक शब्दों का प्रयोग।
  • ट्रॉमा‑इनफ़ॉर्म्ड कोर्टरूम प्रैक्टिस को अनिवार्य करना।
  • पुरानी पितृसत्तात्मक शब्दावली को हटाकर न्यायिक सहानुभूति बढ़ाना।

रिपोर्ट की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त 2026 को "Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments" शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। यह रिपोर्ट एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गई है, जिसका नेतृत्व पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस अनिरुद्ध बोस (साथ ही राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल के निदेशक) ने किया। समिति ने 125 ट्रायल कोर्ट के निर्णयों का विश्लेषण किया और कई व्यावहारिक सुधार सुझाए।

नए हैंडबुक की मुख्य सिफारिशें

रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायिक भाषा में "प्रॉसिक्यूट्रिक्स" जैसे लैंगिक पक्षपातपूर्ण शब्दों को "पीड़ित", "सर्वाइवर" या "शिकायतकर्ता" से बदलना चाहिए। साथ ही, यौन हिंसा को नैतिकता या शालीनता के लेंस से नहीं, बल्कि कानूनी चोट और उसके परिणामों के रूप में प्रस्तुत करने की सलाह दी गई है।

इतिहासिक पृष्ठभूमि

2023 में जारी किए गए हैंडबुक ने मुख्यतः लैंगिक रूढ़ियों की पहचान और उनके उपयोग से बचने पर ध्यान दिया था। लेकिन फरवरी 2026 के एक विवादास्पद निर्णय में, जहाँ अल्लाहाबाद हाई कोर्ट ने 14 वर्षीय बालिका के छाती पकड़ने को "तैयारी" कहा था, सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने हैंडबुक की प्रभावशीलता पर सवाल उठाया। इस घटना ने नए, अधिक व्यावहारिक दिशानिर्देशों की आवश्यकता को उजागर किया।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that adopting survivor‑centric terminology can increase reporting rates of sexual offences and restore public confidence in the judiciary. The shift from theoretical guidelines to hands‑on training reflects a broader global trend toward trauma‑informed justice systems.

"जजों को केवल कानून नहीं, बल्कि पीड़ित के अनुभवों की समझ भी होनी चाहिए," कहते हैं मानवाधिकार विशेषज्ञ डॉ. रिया शर्मा।
क्या आप जानते हैं?: विश्व भर में 70% से अधिक न्यायालय अभी भी पितृसत्तात्मक शब्दावली का उपयोग करते हैं, जिससे पीड़ितों की आवाज़ दब सकती है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या नया हैंडबुक सभी भारतीय न्यायालयों में लागू होगा?
उत्तर: हाँ, इस रिपोर्ट की सिफारिशें राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सम्मिलित की जाएँगी।

प्रश्न 2: क्या इस बदलाव से न्यायिक निर्णयों की गति प्रभावित होगी?
उत्तर: नहीं, यह बदलाव शब्दावली को स्पष्ट करेगा और प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाएगा।