प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुजरात में दो बड़े धनशोधन मामलों में ₹152.5 करोड़ की संपत्ति कुर्क की है। इनमें दाहोद में फर्जी सरकारी कार्यालय बनाकर सरकारी अनुदान हड़पने और अहमदाबाद में बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट धोखाधड़ी का मामला शामिल है।
- प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुजरात में दो अलग-अलग मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ₹152.5 करोड़ की संपत्ति कुर्क की।
- दाहोद घोटाले में आरोपियों ने सिंचाई विभाग के छह फर्जी कार्यालय बनाकर करोड़ों रुपये का सरकारी अनुदान हड़प लिया।
- अहमदाबाद रियल एस्टेट धोखाधड़ी में 250 से अधिक घर खरीदारों से करोड़ों रुपये की ठगी की गई।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुजरात में दो अलग-अलग धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) जांच के सिलसिले में ₹152.5 करोड़ की चल और अचल संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क किया है। इन मामलों में एक बेहद चौंकाने वाला फर्जी सरकारी कार्यालय रैकेट और एक बड़ा रियल एस्टेट धोखाधड़ी का मामला शामिल है। केंद्रीय जांच एजेंसी के अहमदाबाद जोनल कार्यालय ने इस बड़ी कार्रवाई की पुष्टि की है।
एजेंसी द्वारा जारी बयान के अनुसार, पहला मामला दाहोद जिले का है, जहां साल 2023 में भंडाफोड़ हुए फर्जी सरकारी कार्यालय घोटाले के संबंध में ₹22.7 करोड़ की चल और अचल संपत्ति कुर्क की गई है। वहीं, दूसरा मामला अहमदाबाद में एक रियल एस्टेट धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसमें जांच एजेंसी ने ₹129.80 करोड़ मूल्य की अचल संपत्तियों को कुर्क किया है। इन दोनों ही मामलों ने राज्य के प्रशासनिक और नियामक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दाहोद का अनोखा फर्जी सरकारी दफ्तर घोटाला
दाहोद जिले में सामने आया यह मामला बेहद हैरान करने वाला है। मुख्य आरोपी अबू बकर जाकिराली सैयद, उसके परिवार के सदस्यों और सहयोगियों ने मिलकर सिंचाई और जल संसाधन विभाग के छह फर्जी सरकारी कार्यालय खोल दिए। इन फर्जी कार्यालयों के जरिए आरोपियों ने "सिंचाई से संबंधित परियोजनाओं" को लागू करने के बहाने करोड़ों रुपये का सरकारी अनुदान हासिल कर लिया।
इस मामले में गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस (IAS) अधिकारी बी.डी. निनामा सहित कई अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। ED की जांच में सामने आया कि आरोपियों ने सरकारी अधिकारियों का रूप धारण किया, फर्जी सील और हस्ताक्षर तैयार किए, और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कुल 121 फर्जी कार्यों के लिए सरकारी मंजूरी प्राप्त कर ली। इस प्रकार प्राप्त सरकारी धन को बैंक खातों के एक जटिल नेटवर्क के माध्यम से घुमाया गया और बाद में संपत्ति खरीदने तथा निवेश करने में उपयोग किया गया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि ये दोनों मामले भारत में प्रशासनिक और नियामक प्रणालियों में मौजूद गंभीर खामियों को उजागर करते हैं। एक तरफ जहां फर्जी सरकारी दफ्तर बनाकर सीधे सरकारी खजाने को लूटा गया, वहीं दूसरी तरफ RERA नियमों की अनदेखी कर आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई हड़प ली गई। यह दर्शाता है कि वित्तीय घोटालों को रोकने के लिए ऑडिट और रियल एस्टेट नियमों को और अधिक कड़ा करने की तत्काल आवश्यकता है।
"सरकारी खजाने से सीधे धन निकालने के लिए पूरी तरह से फर्जी सरकारी कार्यालयों का निर्माण करना प्रशासनिक निगरानी में एक अभूतपूर्व विफलता को दर्शाता है। यह वित्तीय सुरक्षा प्रणालियों के तत्काल पुनर्मूल्यांकन की मांग करता है।"
अहमदाबाद का बहु-करोड़पति हाउसिंग स्कैम
दूसरा मामला अहमदाबाद का है, जहां ईडी ने नवरंगपुरा और बोपल पुलिस स्टेशनों में दर्ज पांच एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की थी। यह एफआईआर मुख्य आरोपी रोनक सोहनी, विपुल गंगलानी और अन्य के खिलाफ दर्ज की गई थीं। इन आरोपियों ने आकर्षक प्री-लॉन्च कीमतों और 54% से 100% तक के सुनिश्चित रिटर्न का लालच देकर मध्यम वर्गीय परिवारों, छोटे निवेशकों और व्यापारियों को ठगा।
जांच में पाया गया कि इन रियल एस्टेट परियोजनाओं को बिना किसी आवश्यक मंजूरी (जैसे RERA पंजीकरण और एन.ए. अनुमति) के बाजार में बेचा गया। जब खरीदारों ने फ्लैट और दुकानों की मांग की, तो उन्हें न तो कब्जा मिला और न ही उनके पैसे वापस किए गए। आरोपियों ने छारोड़ी परियोजना में 250 से अधिक खरीदारों को धोखा दिया और परियोजना के लिए आरक्षित भूमि को डमी सेल डीड के माध्यम से तीसरे पक्ष को हस्तांतरित कर दिया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गुजरात में वित्तीय धोखाधड़ी और रियल एस्टेट से जुड़े मामले पहले भी सामने आते रहे हैं, लेकिन दाहोद का फर्जी सरकारी कार्यालय घोटाला अपने आप में अनोखा है। भारत के इतिहास में ऐसे बहुत कम मामले दर्ज हैं जहां जालसाजों ने सीधे सरकारी विभाग का रूप धारण कर सीधे राज्य के बजट से धन की चोरी की हो। यह मामला 1990 के दशक के कुछ कुख्यात चारा घोटाले और अन्य प्रशासनिक घोटालों की याद दिलाता है जहां फर्जी फाइलों के जरिए सरकारी खजाने को चूना लगाया गया था।
| मापदंड | दाहोद फर्जी कार्यालय घोटाला | अहमदाबाद रियल एस्टेट घोटाला |
|---|---|---|
| कुर्क की गई संपत्ति | ₹22.7 करोड़ | ₹129.8 करोड़ |
| मुख्य आरोपी | अबू बकर जाकिराली सैयद, बी.डी. निनामा (पूर्व IAS) | रोनक सोहनी, विपुल गंगलानी |
| तरीका (Modus Operandi) | 6 फर्जी सरकारी सिंचाई कार्यालय और 121 फर्जी कार्य | बिना मंजूरी के प्री-लॉन्च स्कीम और डमी सेल डीड |
| प्रभावित पक्ष | सरकारी खजाना / सार्वजनिक धन | 250+ मध्यम वर्गीय घर खरीदार और निवेशक |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: दाहोद फर्जी सरकारी कार्यालय घोटाले में पूर्व आईएएस अधिकारी की क्या भूमिका थी?
उत्तर: पूर्व आईएएस अधिकारी बी.डी. निनामा पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए और आरोपियों के साथ मिलीभगत कर फर्जी सरकारी कार्यालयों को सरकारी अनुदान जारी करने की प्रक्रिया को आसान बनाया।
प्रश्न 2: अहमदाबाद रियल एस्टेट घोटाले में निवेशकों को कैसे ठगा गया?
उत्तर: आरोपियों ने बिना रेरा (RERA) मंजूरी के आकर्षक प्री-लॉन्च ऑफर और 100% तक के रिटर्न का वादा किया। बाद में, उन्होंने निवेशकों के पैसे को डायवर्ट कर दिया और डमी डीड के जरिए जमीन तीसरे पक्ष को बेच दी।