गुजरात पुलिस के CCoE ने एक फर्जी 'डिजिटल अरेस्ट' का सहारा लेकर असम में एक ठग को गिरफ्तार किया और चार राज्यों के 10 लोगों की लाखों रुपये की रकम बचाई।
- गुजरात पुलिस ने असम के बरपेटा निवासी रফিকুল आलम (25) को गिरफ्तार किया।
- एक वरिष्ठ नागरिक की समय पर सूचना ने पुलिस को ठगों के साथ 'खेलने' और उनका बैंक खाता खोजने में मदद की।
- इस ऑपरेशन से गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के 10 पीड़ितों की मेहनत की कमाई बची।
- जांच में 1,754 खातों के जरिए ₹1,071 करोड़ से अधिक के संदिग्ध लेनदेन का पता चला है।
गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CCoE) ने एक बेहद चतुर ऑपरेशन चलाकर एक अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध गिरोह के सदस्य को दबोचा है। पुलिस ने 'डिजिटल अरेस्ट' की तकनीक का ही इस्तेमाल करते हुए असम के बरपेटा निवासी रফিকুল आलम को गिरफ्तार किया, जो विभिन्न बैंक खातों के माध्यम से अपराध की कमाई को ठिकाने लगाने (layering) का काम कर रहा था।
मामले की शुरुआत 9 अगस्त को हुई, जब अहमदाबाद के एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी ने CCoE से संपर्क किया। यह व्यक्ति पिछले सात दिनों से 'डिजिटल अरेस्ट' के दबाव में था। ठगों ने नासिक पुलिस का रूप धारण कर उसे धमकी दी थी कि वह चाइल्ड पोर्नोग्राफी में शामिल है। डर पैदा करने के लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फर्जी समन भेजे गए थे और पीड़ित को प्रतिदिन 3-4 घंटे कॉल पर रहने के लिए मजबूर किया गया था।
पुलिस ने इस स्थिति को एक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया। CCoE ने पीड़ित को निर्देश दिया कि वह ठगों के साथ नाटक करे कि वह अभी भी उनके नियंत्रण में है। सत्यापन के नाम पर, पुलिस ने पीड़ित से ₹200 ट्रांसफर करवाए, जिसके लिए ठगों ने अपना एक बैंक खाता नंबर दिया। इसी खाते के जरिए साइबर पुलिस ने आरोपी का पता लगाया और असम के बरपेटा में छापेमारी कर रফিকুল आलम को गिरफ्तार किया।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला साइबर अपराध के एक नए और खतरनाक दौर को दर्शाता है, जहाँ 'डिजिटल अरेस्ट' का उपयोग मनोवैज्ञानिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। ₹1,000 करोड़ से अधिक का लेनदेन यह संकेत देता है कि भारत में मौजूद लोग केवल मोहरे हैं, जबकि मुख्य मास्टरमाइंड दक्षिण-पूर्व एशिया (संभवतः कंबोडिया) में बैठे हैं।
फर्जी कानून प्रवर्तन पहचान के माध्यम से मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना साइबर धोखाधड़ी का नया मोर्चा है, जिसके लिए पुलिस को अब और अधिक सक्रिय होना होगा।
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि आरोपी के खाते में अन्य पीड़ितों द्वारा ₹50 लाख जमा किए गए थे। पुलिस टीमों ने गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के आठ अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी कर अन्य लोगों को और पैसे भेजने से रोका। सूरत में एक व्यक्ति को प्रवर्तन निदेशालय (ED) के नाम पर आतंकी फंडिंग के फर्जी मामले में डराया गया था, जिससे वह अपनी दुकान तक बेचने को तैयार हो गया था।
वित्तीय आंकड़ों ने पुलिस को हैरान कर दिया। CCoE ने पाया कि ₹1,071.55 करोड़ के लेनदेन के लिए 1,754 खातों का उपयोग किया गया था। पैसे को पकड़े जाने से बचाने के लिए ₹3,000 की छोटी किश्तों में सेकंडों के भीतर ट्रांसफर किया जाता था। इसके अलावा, 23 क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट मिले, जिनसे ₹16 करोड़ चीन भेजे जाने का संदेह है। आरोपी के फोन में "China Ma'am 4" नाम का एक कॉन्टैक्ट भी मिला है।
अधिकारियों का मानना है कि कॉल करने वाले मुख्य अपराधी कंबोडिया में हैं। रফিকুল आलम को ट्रांजिट वारंट पर गुजरात लाया गया है और मामले की गहन जांच जारी है।
| पीड़ित का स्थान | लगाया गया फर्जी आरोप | वित्तीय प्रभाव/जोखिम |
|---|---|---|
| अहमदाबाद | चाइल्ड पोर्नोग्राफी | ₹20 लाख (प्रयास) |
| सूरत | आतंकी फंडिंग (ED) | ₹30 लाख (आंशिक बचाव) |
| जामनगर | फर्जी निवेश मामला | ₹19.5 लाख (आंशिक बचाव) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: 'डिजिटल अरेस्ट' क्या है?
यह एक धोखाधड़ी है जहाँ अपराधी वीडियो कॉल पर पुलिस या सरकारी अधिकारी बनकर पीड़ित को डराते हैं और पैसे की मांग करते हैं।
प्रश्न 2: मैं ऐसे घोटालों से कैसे बच सकता हूँ?
याद रखें कि कोई भी सरकारी एजेंसी (CBI, ED या पुलिस) कभी भी व्हाट्सएप या स्काइप वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी नहीं करती है।