मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव को बच्चों से संबंधित आपराधिक कानूनों में मौजूद खामियों को दूर करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने POCSO और किशोर न्याय अधिनियम के कार्यान्वयन में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।

  • मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव को एक विशेष समिति बनाने का आदेश दिया है।
  • समिति में गृह सचिव, स्वास्थ्य सचिव और विधि सचिव शामिल होंगे।
  • अदालत ने POCSO और किशोर न्याय अधिनियम के कार्यान्वयन में गंभीर खामियों को उजागर किया है।
  • किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में तमिलनाडु के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे बच्चों से संबंधित आपराधिक कानूनों के कार्यान्वयन में मौजूद प्रणालीगत खामियों को दूर करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करें। न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने यह निर्देश एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए दिया।

अदालत ने निर्देश दिया है कि इस समिति में गृह सचिव, स्वास्थ्य सचिव और विधि सचिव शामिल हों। इस समिति का मुख्य कार्य अदालत द्वारा दिए गए उन सुझावों पर विचार करना होगा जो बच्चों के अधिकारों की रक्षा और कानूनों के बेहतर क्रियान्वयन के लिए आवश्यक हैं। अदालत ने सरकार को इन सुझावों पर विचार करने और चार महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। वर्तमान में, POCSO और किशोर न्याय अधिनियम के कार्यान्वयन में कई प्रशासनिक और कानूनी चुनौतियां हैं, जो अक्सर न्याय की प्रक्रिया को बाधित करती हैं। अदालत का यह कदम कानून प्रवर्तन और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने का प्रयास है।

कानूनों का केवल अस्तित्व में होना पर्याप्त नहीं है; उनका निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से कार्यान्वयन ही बच्चों को वास्तविक सुरक्षा प्रदान करता है।

मामले की पृष्ठभूमि में, एक याचिकाकर्ता ने 2017 में हुई एक दर्दनाक घटना का उल्लेख किया था, जिसमें एक सात वर्षीय बच्ची की हत्या और यौन उत्पीड़न का मामला शामिल था। हालांकि अदालत ने सरकार को किसी विशेष मामले में सुधारात्मक याचिका (Curative Petition) दायर करने के लिए मजबूर नहीं किया, क्योंकि यह सरकार का विवेकाधीन अधिकार है, लेकिन अदालत ने व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया।

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि POCSO अधिनियम लिंग-तटस्थ (Gender Neutral) होने के बावजूद, पुलिस अक्सर किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों के मामलों में केवल लड़कों के खिलाफ ही प्राथमिकी (FIR) दर्ज करती है। न्यायाधीशों ने सुझाव दिया कि यदि कोई अभिभावक एफआईआर की मांग करता है, तो पुलिस को उन्हें सूचित करना चाहिए कि लड़के के पास भी समान विकल्प उपलब्ध है।

सुधार के लिए प्रमुख सुझाव

अदालत ने कई महत्वपूर्ण सुधारों की वकालत की है, जिनमें शामिल हैं:

  • बच्चों की पहचान साझा करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाना।
  • POCSO अदालतों में बच्चों के लिए विशेष गवाह कक्ष (Deposition Rooms) उपलब्ध कराना।
  • गर्भावस्था के चिकित्सा समापन और पुरुष पीड़ितों की चिकित्सा जांच के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाना।
Did You Know?: POCSO अधिनियम को लिंग-तटस्थ बनाया गया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कानून सभी बच्चों की सुरक्षा करता है, चाहे उनका लिंग कुछ भी हो।

Frequently Asked Questions

1. मद्रास उच्च न्यायालय ने किस समिति के गठन का निर्देश दिया है?
अदालत ने गृह सचिव, स्वास्थ्य सचिव और विधि सचिव की एक संयुक्त समिति बनाने का निर्देश दिया है।

2. अदालत ने पुलिस के लिए क्या विशेष सुझाव दिए हैं?
अदालत ने सुझाव दिया है कि पुलिस को किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों में केवल लड़कों को अपराधी बनाने के बजाय निष्पक्ष रहना चाहिए और गैर-जघन्य अपराधों में एफआईआर दर्ज करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।