तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक आदेश में नानी द्वारा अवैध रूप से रोके गए 7 महीने के बच्चे को उसके जैविक पिता को सौंपने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक और कानूनी संरक्षक है।
- तेलंगाना हाईकोर्ट ने 7 महीने के बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी।
- अदालत ने नानी द्वारा बच्चे को गुप्त स्थान पर ले जाने को 'संदिग्ध व्यवहार' माना।
- कोर्ट ने माना कि पिता की वित्तीय स्थिति और कानूनी अधिकार बच्चे के भविष्य के लिए बेहतर हैं।
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक संवेदनशील मामले में हस्तक्षेप करते हुए आदेश दिया है कि एक नानी अपने 7 महीने के पोते को उसके पिता को वापस सौंपें। यह मामला तब सामने आया जब पिता ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी की मृत्यु के बाद, उसकी सास (नानी) ने बच्चे को अवैध रूप से अपने पास रख लिया और उसे बच्चे से मिलने नहीं दिया।
न्यायाधीश मौशुमी भट्टाचार्य और रेणुका यारा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि पिता, जैविक पिता होने के नाते, बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक है और उसके पास अपने नाबालिग बेटे की कस्टडी का वैधानिक अधिकार है।
मामले की पृष्ठभूमि: दुखद मोड़ और विवाद
तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने 11 मई 2022 को विवाह किया था और 5 जनवरी 2026 को उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ। हालांकि, 31 मार्च 2026 को एक गंभीर बीमारी के कारण मां का निधन हो गया। इस दुखद घटना के बाद, नानी ने पिता से अनुरोध किया कि बच्चा कुछ दिनों के लिए उनके पास रहे। पिता ने विश्वास में यह अनुरोध स्वीकार कर लिया, लेकिन बाद में नानी ने बच्चे को लौटाने से इनकार कर दिया।
पिता के वकीलों ने अदालत को बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी के इलाज पर लगभग 73 लाख रुपये खर्च किए थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब बच्चा तेज बुखार से पीड़ित था, तब नानी ने उन्हें या उनके माता-पिता को बच्चे को छूने तक नहीं दिया। सबसे गंभीर मोड़ तब आया जब 10 जुलाई को पिता को पता चला कि नानी बच्चे को लेकर बिना बताए एक अज्ञात स्थान पर शिफ्ट हो गई हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं है, बल्कि यह 'प्राकृतिक अभिभावक' (Natural Guardian) के कानूनी अधिकारों की पुष्टि करता है। अक्सर ऐसे मामलों में भावनात्मक तर्कों को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन यहाँ अदालत ने स्थिरता, वित्तीय सुरक्षा और कानूनी अधिकारों को ऊपर रखा है।
"कानून स्पष्ट है कि जब तक पिता की क्षमता पर कोई गंभीर सवाल न हो, जैविक पिता ही बच्चे का प्राथमिक और कानूनी संरक्षक होता है।"
नानी के वकील आर.के. भाटिया ने तर्क दिया कि पिता ने पुनर्विवाह कर लिया है, जिससे बच्चे की देखभाल प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि नानी आर्थिक रूप से अपनी छोटी बेटी पर निर्भर हैं, जबकि पिता एक बैंक में सहायक प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं और बच्चे को एक स्थिर भविष्य देने में सक्षम हैं।
Frequently Asked Questions
1. क्या पुनर्विवाह कस्टडी के अधिकार को प्रभावित करता है?
इस मामले में, कोर्ट ने माना कि केवल पुनर्विवाह कस्टडी छीनने का पर्याप्त आधार नहीं है, जब तक कि यह साबित न हो कि बच्चा असुरक्षित है।
2. कोर्ट ने नानी के व्यवहार को संदिग्ध क्यों माना?
बिना सूचना दिए बच्चे को अज्ञात स्थान पर ले जाना और पिता के संपर्क को रोकना अदालत की नजर में अनुचित और संदिग्ध था।