तेलंगाना उच्च न्यायालय ने उस महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया है, जिस पर अपने अलग रह रहे पति के खिलाफ कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग रिकॉर्ड करने और उसे ऑनलाइन साझा करने का आरोप है।
- तेलंगाना हाईकोर्ट ने आईटी एक्ट और कॉपीराइट एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द करने से मना किया।
- याचिकाकर्ता पर POCSO से संबंधित सुनवाई को रिकॉर्ड कर WhatsApp पर भेजने का आरोप है।
- कोर्ट ने जांच अधिकारी को गिरफ्तारी के संबंध में 'अर्नेश कुमार' दिशा-निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया।
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए उस महिला को राहत देने से इनकार कर दिया है, जिसने कथित तौर पर अपने अलग रह रहे पति के खिलाफ कोर्ट की कार्यवाही को रिकॉर्ड किया और उसे ऑनलाइन प्रसारित किया। यह मामला सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) और कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के प्रावधानों के तहत दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है।
यह पूरा विवाद 13 नवंबर, 2025 को हुई एक सुनवाई से शुरू हुआ। यह मामला POCSO अधिनियम, 2012 के तहत था, जिसमें महिला का पति आरोपी था। पति को जमानत मिलने के बाद महिला ने उस आदेश को चुनौती दी थी। आरोप है कि इसी चुनौती से जुड़ी सुनवाई के दौरान महिला ने लाइव-स्ट्रीमिंग को रिकॉर्ड किया और उसे WhatsApp के माध्यम से अन्य लोगों को भेजा।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला न्यायपालिका की पारदर्शिता (लाइव-स्ट्रीमिंग) और सामग्री के पुनर्वितरण की कानूनी सीमाओं के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है। हालांकि लाइव-स्ट्रीमिंग जनता की पहुंच के लिए है, लेकिन विशेष रूप से POCSO जैसे संवेदनशील मामलों में अनधिकृत रिकॉर्डिंग और प्रसार को अदालत की अवमानना या वैधानिक अपराध माना जा सकता है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि "पहुंच के अधिकार" का मतलब "व्यक्तिगत एजेंडे के लिए साझा करने का अधिकार" नहीं है।
सुनवाई के दौरान, जस्टिस जे श्रीनिवास राव ने कहा कि याचिकाकर्ता का यह दावा कि उसने कोई जानकारी डाउनलोड या साझा नहीं की, एक विवादित तथ्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन तथ्यों का निर्णय केवल पुलिस जांच के दौरान ही किया जा सकता है।
न्यायपालिका अब डिजिटल युग में कोर्ट की कार्यवाही के दुरुपयोग के प्रति अत्यधिक सतर्क है ताकि 'सोशल मीडिया ट्रायल' की प्रवृत्ति को रोका जा सके।
याचिकाकर्ता के वकील रघुनाथ ने तर्क दिया कि तेलंगाना हाईकोर्ट के नियमों के नियम 5 के अनुसार, POCSO मामलों की लाइव-स्ट्रीमिंग प्रतिबंधित है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जांच अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया, जो सात साल से कम सजा वाले अपराधों में अनावश्यक गिरफ्तारी को रोकता है।
अंततः, अदालत ने जांच अधिकारी को BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की प्रक्रियाओं और अर्नेश कुमार मामले के सुरक्षा उपायों का पालन करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता को जांच में सहयोग करने और नोटिस मिलने के बाद कानूनी उपाय अपनाने की अनुमति दी गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या भारत में कोई भी कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग रिकॉर्ड कर सकता है?
हालांकि पारदर्शिता के लिए लाइव-स्ट्रीमिंग की अनुमति है, लेकिन उस सामग्री को रिकॉर्ड करना और साझा करना—विशेषकर संवेदनशील मामलों में—कॉपीराइट एक्ट और कोर्ट नियमों का उल्लंघन हो सकता है।
प्रश्न 2: इस मामले में 'अर्नेश कुमार' केस का क्या महत्व है?
यह केस पुलिस को बाध्य करता है कि वे 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी से पहले कारणों की एक चेकलिस्ट तैयार करें, ताकि किसी को बेवजह जेल न जाना पड़े।