सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए फांसी की सजा को बरकरार रखा है, यह कहते हुए कि यह अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को संवैधानिक रूप से वैध माना।
  • अदालत ने कहा कि फांसी की विधि अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है।
  • याचिकाकर्ताओं ने इसे वैज्ञानिक रूप से अविश्वसनीय और क्रूर बताया था।
  • कोर्ट ने 1983 के 'दीना बनाम भारत संघ' मामले के फैसले को बरकरार रखा।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में फांसी (hanging) को मृत्युदंड देने के एक संवैधानिक तरीके के रूप में बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें तर्क दिया गया था कि फांसी की विधि वैज्ञानिक रूप से अविश्वसनीय है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार का उल्लंघन करती है।

कानूनी आधार और ऐतिहासिक संदर्भ

अदालत का यह निर्णय मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कारकों पर आधारित था। पहला, 1983 का ऐतिहासिक मामला दीना बनाम भारत संघ (Deena vs UOI), जिसमें तीन न्यायाधीशों की पीठ ने फांसी की संवैधानिक वैधता को पहले ही स्वीकार कर लिया था। दूसरा, संसद द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू करते समय फांसी की सजा को बनाए रखने का निर्णय, जिसे न्यायालय ने विधायी पुष्टि के रूप में देखा।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला न केवल कानून बल्कि नैतिकता और विज्ञान के बीच के संघर्ष को भी दर्शाता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि फांसी की प्रक्रिया, जिसे 'लॉन्ग ड्रॉप' विधि के माध्यम से किया जाता है, अक्सर अनपेक्षित परिणाम दे सकती है। उन्होंने एक 1992 के अध्ययन का हवाला दिया जिसमें पाया गया कि फांसी के दौरान गर्दन की हड्डी (C2-C3 vertebrae) का टूटना हमेशा तत्काल मृत्यु का कारण नहीं बनता, जिससे दम घुटने जैसी पीड़ा हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फांसी की विधि, यदि सही ढंग से दी जाए, तो यह क्रूरता या अमानवीयता की श्रेणी में नहीं आती।

हालांकि, केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि भारत में 2003 के बाद से केवल आठ ही फांसी दी गई हैं और अब तक किसी भी 'गलत निष्पादन' (botched execution) का मामला दर्ज नहीं हुआ है। इसके विपरीत, अमेरिका में 'लीथल इंजेक्शन' (lethal injection) की विधि में विफलताओं का एक लंबा इतिहास रहा है।

कानून आयोग की सिफारिशें बनाम संसद का निर्णय

याचिकाकर्ताओं ने 2003 की विधि आयोग (Law Commission) की 187वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें 'लीथल इंजेक्शन' को एक वैकल्पिक और बेहतर विकल्प के रूप में सुझाया गया था। लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधि आयोग की रिपोर्ट केवल संस्तुतिपूर्ण (recommendatory) होती है और संसद ने BNSS के माध्यम से फांसी को बरकरार रखकर अपनी इच्छा व्यक्त की है।

क्या आप जानते हैं?: फांसी की 'लॉन्ग ड्रॉप' विधि का उद्देश्य व्यक्ति की ऊंचाई और वजन के आधार पर गर्दन की हड्डी को तुरंत तोड़ना होता है ताकि तत्काल बेहोशी हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या अनुच्छेद 21 फांसी को रोकता है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, फांसी की विधि गरिमा के अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है यदि इसे सही ढंग से प्रशासित किया जाए।

2. विधि आयोग ने क्या सुझाव दिया था?
विधि आयोग ने मृत्युदंड के विकल्प के रूप में 'लीथल इंजेक्शन' का उपयोग करने का सुझाव दिया था।