बॉम्बे हाई कोर्ट ने डॉ. नरेंद्र दबोल्कर हत्या मामले में सचिन अंदुरे की जमानत मंजूर करते हुए अभियोजन पक्ष के सबूतों को 'अत्यधिक कमजोर' करार दिया है। अदालत ने पाया कि चश्मदीदों ने घटना के लगभग 9 साल बाद आरोपी की पहचान की।

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने सचिन अंदुरे की जीवनभर की सजा को निलंबित करते हुए उसे जमानत दे दी है।
  • अदालत ने पाया कि चश्मदीदों ने घटना के 8 से 9 साल बाद पहली बार अदालत में आरोपी की पहचान की।
  • अतिरिक्त-न्यायिक इकबालिया बयान (Extra-judicial confession) को भी अदालत ने विश्वसनीय नहीं माना।
  • जांच एजेंसी द्वारा बैलिस्टिक रिपोर्ट में विसंगतियों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रसिद्ध तर्कशास्त्री डॉ. नरेंद्र दबोल्कर की हत्या के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी सचिन अंदुरे को जमानत दे दी है। न्यायमूर्ति सारंग कोटवाल और न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोंसले की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों की गुणवत्ता पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंदुरे के खिलाफ सबूत 'बेहद कमजोर' हैं और चश्मदीदों द्वारा की गई पहचान कानूनी रूप से संदिग्ध है।

अदालत के अवलोकन के अनुसार, दो प्रमुख चश्मदीदों ने सचिन अंदुरे की पहचान अदालत में पहली बार मार्च 2022 और नवंबर 2022 में की। यह घटना 20 अगस्त 2013 को हुई हत्या के लगभग आठ साल सात महीने और नौ साल तीन महीने बाद की है। चौंकाने वाली बात यह है कि जांच के दौरान इन गवाहों ने अंदुरे की तस्वीर की पहचान नहीं की थी, बल्कि केवल सह-आरोपी शरद कलस्कर की तस्वीर को पहचाना था। अदालत ने यह भी नोट किया कि कोई 'टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड' (TIP) आयोजित नहीं की गई थी।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि इस मामले में साक्ष्यों की कड़ी में मौजूद बड़ी खामियां भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठाती हैं। जब गवाह इतने लंबे अंतराल के बाद पहचान करते हैं, तो उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है, जिससे न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

साक्ष्यों में देरी और पहचान प्रक्रिया में चूक किसी भी गंभीर आपराधिक मामले की नींव को कमजोर कर सकती है।

अदालत ने अंदुरे के 'एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन' (अतिरिक्त-न्यायिक इकबालिया बयान) को भी खारिज कर दिया। गवाह सोमनाथ धायडे ने यह बयान सीबीआई को अगस्त 2018 में दिया था, जो कथित इकबालिया बयान के पांच साल बाद और अंदुरे की गिरफ्तारी के पांच दिन बाद का था। अदालत ने पाया कि इस बयान की पुष्टि करने के लिए कोई अन्य साक्ष्य मौजूद नहीं था और न ही बयान दर्ज करने वाले अधिकारी का परीक्षण किया गया।

इसके अलावा, बैलिस्टिक रिपोर्ट (Exhibit-495) ने भी संदेह पैदा किया। रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. दबोल्कर के शरीर से बरामद गोलियां उन संदिग्धों के पिस्तौल से मेल खाती थीं जिन्हें घटना के दिन ही गिरफ्तार किया गया था लेकिन बाद में छोड़ दिया गया था। जांच एजेंसी इस विसंगति पर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रही।

तुलना का आधारसचिन अंदुरेशरद कलस्कर
चश्मदीद पहचानतस्वीर की पहचान नहीं की गई थीतस्वीर की पहचान की गई थी
अतिरिक्त साक्ष्यकमजोर इकबालिया बयानसशक्त साक्ष्य मौजूद
अदालत का निर्णयजमानत मंजूरजमानत पहले ही मिल चुकी है
Did You Know?: डॉ. नरेंद्र दबोल्कर महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक थे और उनका हत्याकांड देश में तर्कवाद के लिए एक बड़ा मोड़ था।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: सचिन अंदुरे को जमानत क्यों दी गई?
उत्तर: अदालत ने पाया कि चश्मदीदों की पहचान बहुत देरी से हुई और अभियोजन के पास कोई ठोस सबूत नहीं था।

प्रश्न 2: क्या यह फैसला अंतिम है?
उत्तर: नहीं, यह केवल जमानत के लिए दिया गया निर्णय है। अंदुरे की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील अभी लंबित है।