दिल्ली-एनसीआर से लेकर मुंबई और हैदराबाद तक फैला एक विशाल कैंसर दवा सिंडिकेट बेनकाब हुआ है, जिसमें अस्पताल के कर्मचारी, बिचौलिए और व्यापारी शामिल हैं। पुलिस ने इस नेटवर्क के 17 सदस्यों को गिरफ्तार किया है जो मरीजों के लिए आरक्षित दवाओं को अवैध रूप से बाजार में बेच रहे थे।

  • दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, मुंबई और हैदराबाद तक फैला अंतरराज्यीय नेटवर्क।
  • अस्पताल के कर्मचारियों, बिचौलियों और व्यापारियों द्वारा दवाओं की चोरी का आरोप।
  • कुल 17 आरोपी गिरफ्तार, भारी मात्रा में कैंसर की दवाएं और नकदी बरामद।

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक बेहद चौंकाने वाले मामले का खुलासा किया है, जहां कैंसर के मरीजों के लिए आरक्षित जीवन रक्षक दवाओं को एक व्यवस्थित 'मेडिसिन सिंडिकेट' के माध्यम से अवैध रूप से बाजार में बेचा जा रहा था। यह सिंडिकेट केवल एक स्थान तक सीमित नहीं था, बल्कि दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, मुंबई और हैदराबाद जैसे प्रमुख शहरों में फैला हुआ था। पुलिस के अनुसार, इस रैकेट में अस्पताल के कर्मचारियों से लेकर थोक विक्रेताओं तक की एक लंबी श्रृंखला शामिल थी।

जांच की शुरुआत 12 जुलाई को अभिषेक वैष्णिया की गिरफ्तारी के साथ हुई। एसीपी रमेश लांबा की देखरेख में सात टीमों ने विभिन्न स्थानों पर छापेमारी की। पुलिस को वैष्णिया के पास से भारी मात्रा में दवाएं, पैकेजिंग सामग्री और 4 लाख रुपये नकद बरामद हुए। जांच में पता चला कि वैष्णिया 2022 से अनधिकृत चैनलों के माध्यम से कैंसर की दवाएं खरीदकर उन्हें आगे सप्लाई कर रहा था।

अपराध का तरीका: कैसे काम करता था यह सिंडिकेट?

बोजोकमीडिया विश्लेषण (BozokMedia analysis) से पता चलता है कि यह सिंडिकेट एक जटिल सप्लाई चेन का उपयोग कर रहा था। इस नेटवर्क में अस्पताल के कर्मचारी दवाओं को अस्पताल के स्टोर से गायब करते थे, बिचौलिए उन्हें व्यापारियों तक पहुंचाते थे, और अंत में ये दवाएं अवैध रूप से रिटेल मार्केट में पहुंच जाती थीं।

यह केवल दवाओं की चोरी नहीं है, बल्कि कैंसर से जूझ रहे मासूम मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ करने वाला एक संगठित अपराध है।

पुलिस ने इस मामले में शुभम कुमार चौधरी और उसके भाई सूरज चौधरी को भी गिरफ्तार किया है, जो बिना किसी वैध चालान के नकद में कैंसर की दवाएं खरीदने और बेचने का काम करते थे। इसके अलावा, नोएडा के एक बिचौलिए आनंद कुमार के पास से 337 एंटी-कैंसर वाइल्स बरामद किए गए, जो इस रैकेट के बड़े पैमाने को दर्शाता है।

अस्पताल के अंदर से मिली मदद

इस रैकेट की सबसे भयावह बात यह है कि इसमें अस्पताल के कर्मचारी सीधे तौर पर शामिल थे। जसवंत शर्मा, जो एक प्रतिष्ठित अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग में नर्सिंग इंचार्ज थे, ने कथित तौर पर मरीजों के लिए आरक्षित वाइल्स को चोरी किया। उन्हें दीपक (रवि) नामक एक डेंटल तकनीशियन से जोड़ा गया, जिसने इन दवाओं को आगे फैलाया। इसके अलावा, मनीष शर्मा जैसे नए कर्मचारी भी इस अवैध नेटवर्क का हिस्सा पाए गए।

हैदराबाद और मुंबई तक फैली इस जांच में पुलिस ने पाया कि कई लोग फर्जी चालान बनाने और बैंकिंग चैनलों के माध्यम से अवैध धन को घुमाने का काम भी कर रहे थे। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि इस अपराध से अर्जित संपत्ति का उपयोग कहां किया गया है और क्या इस नेटवर्क में कुछ और बड़े चेहरे शामिल हैं।

Frequently Asked Questions

1. यह रैकेट किन शहरों में सक्रिय था?
यह रैकेट दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, मुंबई और हैदराबाद तक फैला हुआ था।

2. क्या अस्पताल के कर्मचारी इसमें शामिल थे?
हाँ, पुलिस ने नर्सिंग इंचार्ज और अन्य अस्पताल कर्मचारियों को दवाओं की चोरी में शामिल पाया है।