सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई की त्रिभाषा नीति के तहत अंग्रेजी को 'गैर-स्वदेशी' मानने पर सवाल उठाए हैं। अदालत अब इस बात की जांच करेगी कि क्या अंग्रेजी को भारतीय समाज में इसकी गहरी जड़ों के कारण स्वदेशी माना जा सकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी को 'गैर-स्वदेशी' भाषा के रूप में वर्गीकृत करने की संवैधानिकता की जांच करेगा।
  • सीबीएसई की त्रिभाषा नीति (NEP) के तहत छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी होंगी, जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए।
  • अदालत ने बुनियादी ढांचे की कमी को देखते हुए कक्षा 6 के छात्रों के लिए नीति लागू करने में देरी पर विचार करने को कहा है।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए सीबीएसई (CBSE) की त्रिभाषा नीति के तहत अंग्रेजी के वर्गीकरण पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। न्यायालय ने विचार किया कि क्या अंग्रेजी को 'गैर-स्वदेशी' (non-indigenous) भाषा मानना सही है, जबकि भारतीय समाज में इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। यह मामला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत 2026-27 से लागू होने वाली त्रिभाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया।

कानूनी और संवैधानिक बहस

मामले की सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया कि अंग्रेजी की संवैधानिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने तर्क दिया कि अंग्रेजी संविधान के तहत एक आधिकारिक भाषा है, लेकिन इसे 'स्वदेशी' भाषा की तरह भी नहीं माना जा सकता क्योंकि भाषा संस्कृति का वाहन है।

हालांकि, न्यायमूर्ति बागची ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि 'नेटिव' (native) शब्द का उपयोग करना औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है और इसके बजाय 'स्वदेशी' (indigenous) शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि अंग्रेजी के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और भारतीय समाज में इसके प्रभाव को देखा जाए, तो इसकी संवैधानिकता पर पुनर्विचार करना आवश्यक है।

अंग्रेजी को गैर-स्वदेशी कहना ऐतिहासिक रूप से जटिल है, क्योंकि यह भारतीय समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है।

बुनियादी ढांचे और कार्यान्वयन की चुनौतियां

अदालत ने केवल भाषा के वर्गीकरण पर ही नहीं, बल्कि नीति के व्यावहारिक कार्यान्वयन पर भी चिंता व्यक्त की। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अंग्रेजी को गैर-मातृभाषा मानने से छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अदालत ने सीबीएसई से पूछा कि क्या कक्षा 6 के वर्तमान छात्रों को इस नीति से राहत दी जा सकती है, क्योंकि स्कूलों में अभी पर्याप्त बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।

BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि भारत में केवल 4% स्कूल सीबीएसई के तहत आते हैं, जबकि 96% राज्य बोर्डों के अधीन हैं। ऐसे में, नई नीति के तहत शिक्षकों की कमी, विशेष रूप से संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के बी.एड (B.Ed) योग्य शिक्षकों की कमी, एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।

ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में भाषा नीति हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रही है। स्वतंत्रता के बाद से ही हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संतुलन बनाने के लिए विभिन्न नीतियां बनाई गई हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का उद्देश्य मातृभाषा को प्राथमिकता देना है, लेकिन अंग्रेजी की वैश्विक और प्रशासनिक भूमिका इसे एक जटिल स्थान पर रखती है।

क्या आप जानते हैं?: भारत में अंग्रेजी को 'आधिकारिक भाषा' का दर्जा प्राप्त है, न कि 'राष्ट्रभाषा' का, जो इसे एक अनूठा कानूनी स्थान देता है।

Frequently Asked Questions

1. सीबीएसई की त्रिभाषा नीति क्या है?
इस नीति के तहत छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी होती हैं, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए।

2. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी को 'गैर-स्वदेशी' मानने की संवैधानिकता की जांच कर रहा है और कार्यान्वयन की चुनौतियों पर भी विचार कर रहा है।